बुधवार, 31 दिसंबर 2025

आज का इतिहास : 31 दिसंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

 


ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 

31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा दिए गए एक शाही चार्टर के माध्यम से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई थी। इसे पूर्वी इंडीज के साथ व्यापार करने के लिए स्थापित किया गया था। व्यापार से शुरू होकर, कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप पर धीरे-धीरे नियंत्रण कर लिया, जो 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद प्रशासनिक शक्ति में बदल गया। अंत: 1858 में कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत ब्रिटिश राज के अधीन हो गया और 1874 में यह कंपनी पूरी तरह से भंग कर दी गई।


• 'बेसिन की संधि' 

31 दिसंबर 1802 को मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय ने होलकर सरदारों से हारने के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ 'बेसिन की संधि' पर हस्ताक्षर किया। संधि के तहत पेशवा को विदेशी मामलों और सेना का नियंत्रण अंग्रेजों को देना पड़ा। यह संधि मराठा साम्राज्य के पतन का एक निर्णायक बिंदु थी। आगे चलकर द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805) हुआ और 1818 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने पेशवा के क्षेत्रों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया।


लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज्य' का लक्ष्य घोषित

31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' को मुख्य लक्ष्य घोषित किया। लोगों ने ब्रितानी साम्राज्य से पूरी तरह से स्वतंत्र होकर 'अपना राज' बनाने के लिए संघर्ष करने की प्रतिज्ञा की थी। 


परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले के निषेध का समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले के निषेध का समझौता 31 दिसंबर 1988 को हस्ताक्षरित हुआ, जो 27 जनवरी 1991 से प्रभावी हुआ। समझौते का उद्देश्य दोनों देशों को एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों या सुविधाओं पर सीधे या परोक्ष रूप से हमला करने से रोकना है। 


आज इनकी पुण्यतिथि है...

1956 - पंडित रविशंकर शुक्ल जी

पंडित रविशंकर शुक्ल जी (1877–1956) स्वतंत्रता सेनानी और अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे। वे 1937 में केंद्रीय प्रांत और बरार के मुख्यमंत्री बने। 1946 से 1956 तक मध्य प्रांत के मुख्यमंत्री रहे और 1956 में मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। उनके नाम पर रायपुर में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय स्थापित है। 

1965 - वी. पी. मेनन जी

वी. पी. मेनन के नाम से जाने जाने वाले राय बहादुर वाप्पला पंगुन्नि मेनन (1893-1965) भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक प्रतिष्ठित अधिकारी थे। वे सरदार वल्लभभाई पटेल जी के सहयोगी के रूप में भी याद किए जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारतीय रियासतों के एकीकरण में उनकी अहम् भूमिका रही।  

आज का इतिहास : 30 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं

 


सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया

30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में पहली बार भारतीय तिरंगा फहराया और इसे ब्रिटिश शासन से मुक्त घोषित कर अंडमान को ‘शहीद द्वीप’ और निकोबार को ‘स्वराज द्वीप’ नाम दिया।


मद्रास को पहला नगर निगम बनाने रॉयल चार्टर जारी

 ब्रिटेन के राजा जेम्स द्वितीय द्वारा 30 दिसंबर 1687 को जारी एक रॉयल चार्टर के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 29 सितंबर 1688 को मद्रास निगम स्थापित किया गया था। यह भारत में पहला नगर निगम था, इसके बाद 1726 में बॉम्बे और कलकत्ता में निगम बने।


इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फाँसी

30 दिसंबर 2006 को इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को बगदाद में फाँसी दी गई। 1982 में 148 शियाओं की हत्या (दुजैल नरसंहार) के लिए मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी पाए जाने पर, इराकी विशेष न्यायाधिकरण ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। 


आज इनकी पुण्यतिथि है - 


1971 - डॉ. विक्रम साराभाई

डॉ. विक्रम साराभाई भारत के महान वैज्ञानिक और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं। उनके नेतृत्व में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान की नींव पड़ी और आगे चलकर इसरो (ISRO) का विकास हुआ। 

1975 - दुष्यंत कुमार जी

दुष्यंत कुमार हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय कवि और ग़ज़लकार थे। उन्होंने ग़ज़ल को मंच, आंदोलन और जनसंघर्ष की भाषा बनाया। उनकी पंक्ति - “हो गई है पीर पर्वत-सी…” हिन्दी साहित्य की अमर पंक्तियों में गिनी जाती है।

1990 - रघुवीर सहाय जी

रघुवीर सहाय हिन्दी के प्रख्यात कवि, कथाकार और पत्रकार थे। वे नयी कविता आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं। 'लोग भूल गए हैं’, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ जैसी रचनाएँ उन्हें विशिष्ट पहचान देती हैं।

2009 - राजेन्द्र अवस्थी जी

राजेन्द्र अवस्थी हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के प्रतिष्ठित नाम थे। वे लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका ‘कादम्बिनी’ के लंबे समय तक संपादक रहे। उनकी लेखनी और संपादकीय दृष्टि ने हिन्दी पत्रकारिता को नई ऊँचाइयाँ दीं।



सोमवार, 29 दिसंबर 2025

आज का इतिहास : 29 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं...

 


सुनील गावस्कर का सर्वश्रेष्ठ टेस्ट स्कोर

29 दिसंबर 1983 को भारतीय क्रिकेटर सुनील गावस्कर ने चेन्नई में वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध नाबाद 236 रन का अपना सर्वश्रेष्ठ टेस्ट स्कोर बनाया। जो उस समय किसी भी भारतीय बल्लेबाज़ का सर्वोच्च स्कोर था। वर्तमान में भारतीय क्रिकेटरों में सर्वाधिक व्यक्तिगत टेस्ट स्कोर 319 रन वीरेन्द्र सहवाग के नाम दर्ज है, जो 2008 में चेन्नई में दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध था।  


जैव विविधता संधि लागू दिवस

संयुक्त राष्ट्र की जैव विविधता संधि 29 दिसंबर 1993 को प्रभाव में आई। इसी कारण प्रारंभ में यह दिन अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के रूप में मनाया जाता था, जिसे बाद में 22 मई कर दिया गया।


जन्म दिवस -


• मास्टर दीनानाथ मंगेशकर जी

मराठी रंगमंच के प्रसिद्ध अभिनेता, गायक और संगीतज्ञ मास्टर दीनानाथ मंगेशकर जी का जन्म 29 दिसम्बर 1900 को गोवा में मंगेशी गांव में हुआ था। वे स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के पिता थे। उनके नाम पर भारतीय संगीत, नाट्य, कला, सामाजिक सेवा के क्षेत्र में "मास्टर दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार" स्थापित है।


रामानन्द सागर जी

भारत में सबसे लंबे समय तक चले और सर्वाधिक लोकप्रिय टेलीविज़न धारावाहिक "रामायण" बनाकर इतिहास रचने वाले प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक रामानन्द सागर जी का जन्म 29 दिसंबर 1917 को लाहौर में हुआ था। उन्होंने आँखेंं, ललकार, गीत आरजू आदि अनेक सफल फ़िल्मों का निर्माण भी किया।


निधन -


पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर

भारत के प्रसिद्ध संगीतज्ञ एवं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर (1897-1967) ग्वालियर घराने से संबंधित थे। आज़ादी की पहली सुबह उनके ही स्वरों से राग- 'देश' में निबद्ध होकर बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना ‘वन्देमातरम्’ आकाशवाणी से प्रसारित हुई थी। 


मंजीत बावा

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार मंजीत बावा (1941-2008) पहले चित्रकार थे, जिन्होंने पश्चिमी कला में प्रभावी ग्रे और ब्राउन से हटकर लाल और बैंगनी जैसे रंगों को चुना। उनके चित्रों पर प्रकृति, सूफी रहस्यवाद और भारतीय धर्म का गहरा प्रभाव था।



रविवार, 28 दिसंबर 2025

आज का इतिहास : 28 दिसंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

 


पंडित सुन्दरलाल शर्मा जी की पुण्यतिथि 


छत्तीसगढ के गांधी के रूप में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक और साहित्यकार पंडित सुंदरलाल शर्मा जी का निधन 28 दिसंबर 1940 को हुआ था। वे छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ में छुआछूत, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास के खिलाफ काम किया। वे कंडेल सत्याग्रह के प्रमुख सूत्रधार थे। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उनके नाम पर "पंडित सुंदरलाल शर्मा सम्मान" दिया जाता है।


रतन टाटा जी का जन्मदिन 


भारतीय उद्योग जगत की मशहूर हस्ती रतन नवल टाटा जी का जन्म 28 दिसंबर 1937 को हुआ था। उन्होंने टाटा समूह का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल में टाटा समूह ने वैश्विक विस्तार किया। उन्हें नवाचार और जनकल्याण से जुड़ी सोच के लिए जाना जाता है। उद्योग के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।


धीरूभाई अंबानी जी का जन्म दिवस 


भारत के अग्रणी उद्यमी और रिलायंस समूह के संस्थापक धीरूभाई अंबानी जी का जन्म 28 दिसंबर 1932 को हुआ था। उन्होंने सीमित संसाधनों से शुरुआत कर रिलायंस को भारत की सबसे प्रभावशाली औद्योगिक कंपनियों में स्थापित किया। जोखिम लेने की क्षमता, दूरदर्शिता और आत्मनिर्भर भारत की सोच धीरूभाई अंबानी की उद्यमशील विरासत के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।


कुशाभाऊ ठाकरे जी की पुण्यतिथि 


कुशाभाऊ ठाकरे जी (1922–2003) भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख वैचारिक स्तंभ और संगठनकर्ता थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आए और लंबे समय तक भारतीय जनसंघ व बाद में भाजपा के संगठनात्मक ढांचे को सुदृढ़ करने में लगे रहे। 1998 से 2000 तक उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। अनुशासित जीवन, सादगी और कार्यकर्ताओं के बीच गहरी पैठ के कारण वे “संगठन पुरुष” के रूप में पहचाने जाते हैं। 


अरुण जेटली जी का जन्म दिवस 


अरुण जेटली जी (28 दिसंबर 1952 - 24 अगस्त 2019) भारत के प्रमुख राजनेता, प्रखर वक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता थे। वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे और केंद्र सरकार में वित्त, रक्षा, कॉर्पोरेट कार्य, सूचना एवं प्रसारण जैसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों का दायित्व संभाला। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने वस्तु एवं सेवा कर (GST) जैसे ऐतिहासिक कर सुधार को लागू करने में निर्णायक भूमिका निभाई। 


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन 


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को बंबई (अब मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में देश भर के 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इसकी अध्यक्षता व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने की थी। कांग्रेस की स्थापना में सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ए.ओ. ह्यूम की प्रमुख भूमिका थी।


कोलकाता में पहली बार बोलती फ़िल्म मेलोडी ऑफ लव प्रदर्शित


28 दिसंबर 1928 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) के एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस में पहली बार बोलती फिल्म 'मेलोडी ऑफ लव' प्रदर्शित की गई थी। यह 1928 में निर्मित एक अमेरिकी रोमांटिक फिल्म थी। यह ऐतिहासिक प्रदर्शन मदन थिएटर्स के प्रयास से हुआ, जो भारत में ध्वनि सिनेमा की शुरुआत का संकेत था। भारतीय सिनेमा में पहली आधिकारिक बोलती फिल्म 'आलम आरा' 14 मार्च 1931 में रिलीज़ हुई थी।



शनिवार, 27 दिसंबर 2025

आज का इतिहास : 27 दिसंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

 


• विश्व बैंक की स्थापना 


विश्व बैंक की स्थापना 27 दिसंबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण और विकास के उद्देश्य से हुई। यह 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन का प्रमुख परिणाम था। प्रारंभ में इसे अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (IBRD) के रूप में स्थापित किया गया, जो आज विश्व बैंक समूह का एक प्रमुख अंग है। विश्व बैंक का मुख्य उद्देश्य युद्ध-प्रभावित देशों के पुनर्निर्माण में सहायता करना, गरीबी उन्मूलन और विकासशील देशों को वित्तीय व तकनीकी सहयोग प्रदान करना है। इसका मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. अमेरिका में स्थित है। वर्तमान में IBRD के 189 सदस्य देश हैं। 


शहीद लांस नायक अल्बर्ट एक्का का जन्म दिवस 


27 दिसंबर 1942 को जन्मे लांस नायक अल्बर्ट एक्का भारतीय सेना के उन वीर सपूतों में शामिल हैं, जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान दिया। वे बिहार रेजिमेंट की 14वीं बटालियन में सेवारत थे। 1971 के भारत–पाक युद्ध के दौरान, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के गंगासागर क्षेत्र में उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में दुश्मन की मजबूत चौकियों पर आक्रमण किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी असाधारण बहादुरी, नेतृत्व और आत्मबलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया। 


मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ का जन्म दिवस 


उर्दू और फ़ारसी साहित्य के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा उतर प्रदेश में हुआ था। उनका पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ बेग था। ग़ालिब का काव्य जीवन, प्रेम, पीड़ा, दर्शन और अस्तित्व संबंधी प्रश्नों की गहरी अभिव्यक्ति करता है। उन्होंने ग़ज़ल को केवल प्रेम-काव्य तक सीमित न रखकर उसमें बौद्धिकता, आत्मचिंतन और दार्शनिक गहराई जोड़ी। ग़ालिब की शायरी आज भी साहित्य, संस्कृति और जनमानस में कालजयी प्रभाव बनाए हुए है, और उन्हें उर्दू साहित्य की आधुनिक चेतना का अग्रदूत माना जाता है।


बेनज़ीर भुट्टो की हत्या 


27 दिसंबर 2007 को रावलपिंडी में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री और तत्कालीन विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता बेनज़ीर भुट्टो की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वे जनवरी 2008 में होने वाले चुनावों से पहले प्रचार कर रही थीं। लियाकत नेशनल बाग में एक राजनीतिक रैली के बाद उन पर गोलियां चलाई गईं और गोलीबारी के तुरंत बाद एक आत्मघाती बम विस्फोट किया गया। रावलपिंडी जनरल अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। 


सार्वजनिक रूप से पहली बार ‘जन गण मन’ का गायन


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ का पहली बार सार्वजनिक रूप से गायन 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता वार्षिक अधिवेशन में हुआ था। इस रचना में भारत के विभिन्न प्रांतों और जनसमूहों का प्रतीकात्मक उल्लेख है, जो एकीकृत राष्ट्र की अवधारणा या राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है। स्वतंत्रता के पश्चात 24 जनवरी 1950 को ‘जन गण मन’ को भारत के राष्ट्रगान के रूप में औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया।



शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

आज का इतिहास : 26 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं

 


वीर बाल दिवस 


भारत में हर साल 26 दिसंबर को 'वीर बाल दिवस' मनाया जाता है। यह दिन सिखों के दसवें गुरु 'श्री गुरु गोबिंद सिंह जी' के छोटे साहिबजादों - 'बाबा जोरावर सिंह' और 'बाबा फतेह सिंह' के अद्वितीय बलिदान को याद करने के लिए समर्पित है। 1705 में मुगल शासकों ने दोनों छोटे साहिबजादों को कैद कर धर्म परिवर्तन के लिए घोर यातनाएं दीं, लेकिन उन्होंने सिख धर्म त्यागने से इनकार कर दिया, इस वजह से उन्हें दीवार में जिंदा चिनवा कर शहीद किया गया। बहुत कम उम्र में धर्म, सच्चाई और मानवता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देने वाले इन दोनों वीर बालकों के साहस और बलिदान को राष्ट्र सदैव याद रखे, इस उद्देश्य से 9 जनवरी 2022 को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के दिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 'वीर बाल दिवस' की घोषणा की थी।


अमर शहीद ऊधम सिंह की जयंती 


महान क्रांतिकारी अमर शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 का जन्म पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ था। उन्होंने 13 अप्रैल 1919 ई. को पंजाब में हुए भीषण जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल माइकल ओ'डायर की लंदन में गोली मारकर हत्या कर निर्दोष भारतीय लोगों की मौत का बदला लिया था। 31 जुलाई 1940 को उन्हें 'पेंटनविले जेल' में फाँसी दे दी गयी। 


पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पुण्यतिथि


डॉ. मनमोहन सिंह भारत के 13वें प्रधानमंत्री थे। उनका जन्म पाकिस्तान में 26 सितंबर सन् 1932 ई. को 'गाह' नामक गाँव में हुआ था। देश के विभाजन के बाद उनका परिवार भारत चला आया। वे एक कुशल राजनेता और प्रशासक के साथ-साथ उच्च कोटि के विद्वान, अर्थशास्त्री और विचारक भी थे। वे 22 मई 2004 से 26 मई 2014 तक प्रधानमंत्री रहे। 26 दिसंबर 2024 को उनका निधन हुआ। 


मुग़ल बादशाह बाबर का इंतकाल 


भारतीय इतिहास में 'बाबर' के नाम से प्रसिद्ध, मुग़ल शासक 

'ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर' का इंतकाल 26 दिसम्बर 1530 ई. को आगरा में हुआ था। वह भारत में 'मुग़ल वंश का संस्थापक' था। 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में 'दिल्ली सल्तनत' के अंतिम वंश (लोदी वंश) के 'सुल्तान इब्राहीम लोदी' को पराजित कर बाबर ने 'भारत में मुग़ल वंश की स्थापना' की थी। 



गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

इतिहास : 25 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएँ



•  अटल जी की जयंती 'सुशासन दिवस'


पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन लोकतांत्रिक मूल्यों और सुशासन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के कारण भारत में 'सुशासन दिवस' के रूप में मनाया जाता है। उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक और प्रखर वक्ता, कवि तथा अत्यंत लोकप्रिय राजनेता थे। वे तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने। पहली बार 16 मई 1996, दूसरी बार 19 मार्च 1998 और तीसरी बार 13 अक्टूबर 1999 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने 1998 में पोखरण में पाँच परमाणु परीक्षण कर विश्व को भारत की परमाणु क्षमता का अहसास कराया। कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाई। राष्ट्र के प्रति अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। 


पंडित मदनमोहन मालवीय जी की जयंती 


महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी (1861–1946) महान शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे। उन्होंने 1916 में 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' (BHU) की स्थापना की, जो भारत के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक है। राष्ट्र सेवा में अतुलनीय योगदान के लिए 2014 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

 

Christmas Day 

 

क्रिसमस ईसा मसीह या यीशु (Jesus Christ) के जन्म की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। यह 25 दिसंबर को पूरे विश्व में मनाया जाता है। इस दिन मसीही समाज के लोग अपने आराध्य प्रभु यीशु की आराधना करते हैं, जिन्होंने दुनिया को प्रेम, क्षमा, करुणा का संदेश दिया। उनके आगमन की खुशी में अपने घरों की विशेष साज-सज्जा कर एक-दूसरे को उपहार देते हुए खुशियाँ बाँटते हैं। 


गोर्बाचोव के त्यागपत्र के साथ सोवियत संघ का अंत 


25 दिसंबर 1991 को सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के इस्तीफे के साथ ही सोवियत संघ का आधिकारिक तौर पर अंत हो गया। सोवियत संघ के विघटन से रूस, यूक्रेन, बेलारूस, अज़रबैजान, जॉर्जिया, आदि 15 स्वतंत्र गणराज्यों का उदय हुआ। 


चार्ली चैपलिन का निधन 


 हॉलीवुड के मूक फिल्मों के दिग्गज अभिनेता और निर्देशक चार्ली चैपलिन का निधन 25 दिसंबर 1977 को स्विट्जरलैंड में हुआ। अपनी प्रतिष्ठित "द ट्रैम्प" (The Tramp) भूमिका के लिए मशहूर, चैपलिन का 75 वर्षों का करियर मूक सिनेमा के सुनहरे दौर का प्रतीक रहा। 


धर्मवीर भारती जी का जन्म दिवस 


धर्मवीर भारती जी (1923–1997) आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान रचनाकार थे। उनका उपन्यास 'गुनाहों का देवता' तथा काव्य-नाटक 'अंधा युग' हिन्दी साहित्य की कालजयी कृतियाँ हैं। वे लंबे समय तक 'धर्मयुग' पत्रिका के संपादक रहे और साहित्य को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़ा।


संगीतकार नौशाद का जन्म दिवस 


नौशाद (1919–2006) हिन्दी सिनेमा के सर्वाधिक प्रभावशाली संगीतकारों में से एक थे। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय फिल्म संगीत से जोड़ा। बैजू बावरा, मुग़ल-ए-आज़म और मदर इंडिया जैसी फिल्मों में उनका संगीत भारतीय फिल्म संगीत की धरोहर माना जाता है। 


• सर आइज़ैक न्यूटन का जन्म दिवस 


सर आइज़ैक न्यूटन  (1642–1727) विश्व इतिहास के महानतम वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। उन्होंने 'गति के नियम' और 'सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत' प्रतिपादित किया। उनकी पुस्तक 'प्रिंसिपिया' आधुनिक भौतिकी की आधारशिला मानी जाती है। 


ज्ञानी ज़ैल सिंह जी की पुण्यतिथि 


ज्ञानी ज़ैल सिंह (1916–1994) भारत के सातवें राष्ट्रपति थे। वे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे और पंजाब के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय गृह मंत्री भी रहे। राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय राजनीति के एक जटिल दौर से जुड़ा रहा, फिर भी वे सादगी और जनसंपर्क के लिए जाने जाते हैं।


• चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी की पुण्यतिथि 


चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी (1878–1972) स्वतंत्रता सेनानी, विचारक और प्रशासक थे। वे स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर जनरल रहे। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और भारत के गृहमंत्री के रूप में भी उन्होंने सेवा दी। 


बुधवार, 24 दिसंबर 2025

इतिहास : 24 दिसंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

 


राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस


'राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस' भारत में प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को मनाया जाता है। इसी दिन 1986 में 'उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम' को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई थी। इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों, कर्तव्यों और संरक्षण तंत्र के प्रति जागरूक करना है।


अमर गायक मुहम्मद रफ़ी का जन्म दिवस 


हिंदी सिनेमा के अमर पार्श्व गायक मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर 1924 को पंजाब में हुआ था। उन्होंने फ़िल्म संगीत में अपने जीवनकाल में हजारों गीतों को आवाज़ दी और उन्हें पद्मश्री, कई फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार तथा राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 


 • वाजपेयी जी को 'भारत रत्न' देने की घोषणा 


भारत सरकार ने 24 दिसंबर 2014 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और स्वतंत्रता सेनानी पंडित मदन मोहन मालवीय जी (मरणोपरांत) को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित करने की घोषणा की थी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी ने 27 मार्च 2015 को वाजपेयी जी को उनके आवास पर यह सम्मान प्रदान किया। 


विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना 


 गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने 23 दिसंबर 1921 को शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल में 'विश्व-भारती विश्वविद्यालय' की स्थापना की थी। वर्ष 1951 में इसे एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और 'राष्ट्रीय महत्व का संस्थान' घोषित किया गया। सितंबर 2023 में 'यूनेस्को' ने 'शांतिनिकेतन' को 'विश्व विरासत स्थल' के रूप में मान्यता दी। 


वास्को डी गामा का भारत में निधन 


1498 में यूरोप से भारत का सीधा समुद्री मार्ग खोजने वाले प्रसिद्ध पुर्तगाली खोजी नाविक 'वास्को डी गामा' की मृत्यु 24 दिसंबर 1524 को कोच्चि (केरल) में हुई थी। उन्हें यहीं दफनाया गया, फिर 1538 में उनके अवशेष पुर्तगाल ले जाए गए। 


विश्व शतरंज चैंपियन बने विश्वनाथन आनंद


24 दिसंबर 2000 को विश्वनाथन आनंद ने FIDE विश्व शतरंज चैंपियनशिप जीतकर इतिहास रच दिया। वे विश्व शतरंज चैंपियन बनने वाले पहले भारतीय बने। आगे चलकर 2007, 2008, 2010 और 2012 में भी वे विश्व चैंपियन बने। उनकी सफलता से भारत में शतरंज को व्यापक लोकप्रियता मिली और आगे चलकर कई युवा ग्रैंडमास्टर्स उभरे।



मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

इतिहास : 23 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं




किसान दिवस 


23 दिसम्बर को भारत में 'किसान दिवस' मनाया जाता है। इस दिन प्रमुख किसान नेता पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती मनाई जाती है। उनका जन्म 23 दिसम्बर 1902 को उत्तर प्रदेश के शहरी जिले में हुआ था। भारतीय कृषि नीति में उनके योगदान को याद किया जाता है यह दिन सैनिकों के सम्मान और अधिकार पर केंद्रित है।


शनि के उपग्रह 'रिया' की खोज 


इटालियन-फ़्रांसीसी खगोलशास्त्री जियोवनी डोमेनिको कैसिनी ने 23 दिसंबर 1672 को शनि के चंद्रमा रिया (रिया) की खोज की थी। यह शनि का दूसरा चंद्रमा था। कैसिनी ने रिया के अलावा शनि के तीन अन्य मूनों इपेटस (1671), टेथिस (1684) और डायोन (1684) की भी खोज की। रिया शनि का दूसरा सबसे बड़ा चंद्रमा है। 


पी. वी. नरसिंह राव जी की स्मृति 


पामुलापति वैंकट नरसिंह राव जी भारत के नौवें प्रधानमंत्री थे। वे 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक प्रधानमंत्री रहे। उनके कार्यकाल में 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को उदारीकरण की दिशा में धीरे-धीरे ख़त्म कर दिया। 23 दिसम्बर 2004 को उनका निधन हो गया। वर्ष 2024 में भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया।


रामवृक्ष बेनीपुरी जी का जन्म दिवस


23 दिसंबर 1899 को हिंदी के महान वैज्ञानिक रामवृक्ष बेनीपुरी जी का जन्म हुआ। वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए हैं और उनके साहित्य में सामाजिक वैयक्तिकता और राष्ट्रीय भावना का तंबाकू रूप शामिल है। 'जय प्रकाश', 'नेत्रदान', 'सीता की मां', 'विजेता', 'मील के पत्थर', 'गेहूँ और गुलाब' आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।


स्वामी श्रद्धानन्द जी की स्मृति 


स्वामी दयानंद सरस्वती जी के शिष्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक स्वामी श्रद्धानंद जी ने 1901 में ब्रिटेन में वैदिक धर्म और भारतीय शिक्षा दीक्षा वाले संस्थान "गुरुकुल" की स्थापना की। इस समय यह मानद विश्वविद्यालय है, जिसका नाम 'गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय' है। 23 दिसम्बर 1926 को उनका निधन हो गया।



सोमवार, 22 दिसंबर 2025

इतिहास : 22 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं

 



श्रीगुरु गोविंद सिंह जी प्रकाश पर्व


श्रीगुरु गोविंद सिंह जी (1666–1708) सिख पंथ के दसवें एवं अंतिम मानव गुरु थे। उनका जन्म 22 दिसंबर 1666 ई. को पटना साहिब (वर्तमान बिहार) में हुआ। उनका जीवन धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए समर्पित रहा। 1699 ई. में बैसाखी के अवसर पर उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने सिख समुदाय को एक संगठित, अनुशासित और समानतावादी पहचान दी। उन्होंने अन्याय और धार्मिक उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष को धर्म का अंग माना। उन्होंने 'दसम ग्रंथ' की रचना की, जिसमें वीर रस, नीति और आध्यात्मिक चिंतन का समन्वय है। 1708 ई. में नांदेड़ (महाराष्ट्र) में उन्होंने 'गुरु ग्रंथ साहिब' को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया।


राष्ट्रीय गणित दिवस (रामानुजम स्मृति दिवस)


श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (1887-1920) एक महान् भारतीय गणितज्ञ थे। उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष 22 दिसम्बर को 'राष्ट्रीय गणित दिवस' मनाया जाता है। रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को कोयम्बटूर के समीप ईरोड नाम के ग्राम में हुआ था। इन्होंने संख्या सिद्धांत, विश्लेषण, अनंत श्रेणियाँ और निरंतर भिन्नांशों में महत्वपूर्ण परिणाम दिए। उनके द्वारा गणित के लिए किए गए अनुसंधान आज भी दुनिया भर के गणितज्ञों के लिए प्रेरणा हैं। हालांकि इनके द्वारा किए गए अधिकांश कार्य अभी भी वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं। 


भारत में पहली मालगाड़ी चली


भारत में पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को मुंबई से ठाणे के बीच चली थी, लेकिन पहली मालगाड़ी 22 दिसंबर 1851 को उत्तराखंड के रुड़की से पिरन कलियर के बीच चलाई गई थी। गंगा नहर के निर्माण के लिए मिट्टी और निर्माण सामग्री ढोने के लिए इस भाप इंजन वाली ट्रेन का उपयोग किया गया था, जो 10 किमी की दूरी 38 मिनट में तय करती थी। इस ट्रेन में इस्तेमाल होने वाले भाप इंजन का नाम 'थॉमसन' था, जिसे इंग्लैंड से मंगाया गया था।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

इतिहास : 21 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं...

 



महात्मा गांधी का धमतरी आगमन 


अपने प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान महात्मा गांधी जी 21 दिसंबर 1920 को धमतरी पहुंचे। पंडित सुंदरलाल शर्मा जी के आमंत्रण पर वे कंडेल नहर सत्याग्रह में शामिल होने के लिए आए थे। गांधी जी के आगमन की सूचना मात्र से ही ब्रिटिश सरकार ने किसानों पर लगाए गए जुर्माने (नहर पानी टैक्स) को वापस ले लिया, जो एक बड़ी जीत थी। मकईबंध चौक में जनसभा को संबोधित करते हुए गांधी जी ने सत्य, अहिंसा आधारित सत्याग्रह का महत्व प्रतिपादित करते हुए कंडेल नहर सत्याग्रह के सफल संचालन के लिए बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जी, नारायण राव मेघावाले जी और सुंदरलाल शर्मा जी की सराहना की। गांधीजी का यह प्रवास असहयोग आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ में जनजागरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।


ठाकुर प्यारेलाल सिंह जयंती 


ठाकुर प्यारेलाल सिंह जी (1891-1954) छत्तीसगढ़ में 'श्रमिक आन्दोलन' के सूत्रधार तथा 'सहकारिता आन्दोलन' के प्रणेता थे। उनका जन्म 21 दिसम्बर 1891 ई. को राजनांदगांव जिले के 'दैहान' नामक ग्राम में हुआ था। उन्होंने राजनांदगांव में मिल मज़दूरों को संगठित किया। उनके नेतृत्व में 1919 में मज़दूरों ने देश की सबसे पहली और लम्बी हड़ताल की थी। वे 1920 में महात्मा गाँधी के संपर्क में आए और असहयोग आंदोलन एवं सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय रहते हुए जेल गए। 1937 में रायपुर नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए। 1945 में छत्तीसगढ़ के बुनकरों को संगठित करने के लिए आपके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ की स्थापना हुई। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनकी स्मृति में सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 'ठाकुर प्यारेलाल सिंह सम्मान' दिया जाता है। 


• पंडित सुन्दरलाल शर्मा जयंती 


'छत्तीसगढ़ का गाँधी' कहे जाने वाले पंडित सुन्दरलाल शर्मा जी (1881-1940) का जन्म 21 दिसम्बर 1881 ई. को राजिम के निकट महानदी के तट पर बसे ग्राम चंद्रसूर में हुआ था। वे अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और कवि थे। उन्होंने हिन्दी तथा छत्तीसगढ़ी में लगभग 18 ग्रंथों की रचना की, जिसमें 'छत्तीसगढ़ी दान-लीला' उल्लेखनीय है। वे 'राष्ट्रीय कृषक आंदोलन', 'मद्यनिषेध', 'आदिवासी आंदोलन' तथा 'स्वदेशी आंदोलन' से जुड़े रहे। 'असहयोग आंदोलन' के दौरान जेल गए। हरिजनोद्धार व सामाजिक सुधार के उनके कार्यों की महात्मा गांधी ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उनकी स्मृति में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा साहित्य/आंचिलेक साहित्य के लिए 'पण्डित सुन्दरलाल शर्मा सम्मान' प्रदान किया जाता है। बिलासपुर में इनके नाम पर 'पण्डित सुन्दरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय' स्थापित है। 

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

20 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं



महात्मा गांधी का प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन 


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की छत्तीसगढ़ की प्रथम यात्रा 20 दिसंबर 1920 को हुई थी, जिसमें वे पंडित सुंदरलाल शर्मा के साथ रायपुर आए थे। धमतरी के कण्डेल सत्याग्रह (नहर सत्याग्रह) के लिए आए गांधीजी ने इस यात्रा के दौरान रायपुर में सभाएं कीं और लोगों को असहयोग आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया, जिससे पूरे अंचल में स्वतंत्रता की अलख जगी। रायपुर स्टेशन पर आगमन के बाद, उन्होंने आज के गांधी चौक पर सभा की तथा रायपुर के आनंद वाचनालय (ब्राह्मणपारा) में महिलाओं को संबोधित किया, जहाँ महिलाओं ने उन्हें तिलक स्वराज फंड के लिए अपने गहने भेंट किए।


रॉबर्ट क्लाइव बंगाल के पहले गवर्नर नियुक्त 


1757 ई. में प्लासी के युद्ध में विजय के पश्चात रॉबर्ट क्लाइव को ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बंगाल का पहला गवर्नर नियुक्त किया गया। यद्यपि उस समय औपचारिक प्रशासन नवाब के नाम पर चलता रहा, परंतु वास्तविक सत्ता कंपनी और क्लाइव के हाथों में केंद्रित हो गई। रॉबर्ट क्लाइव की भूमिका ने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की संस्थागत नींव रखी, जिसके कारण क्लाइव को भारत में ब्रिटिश सत्ता का संस्थापक माना जाता है।


• 61वाँ संविधान संशोधन से मताधिकार की आयु 18 वर्ष 


भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में युवाओं को अधिक व्यापक भागीदारी का अवसर देने के उद्देश्य से 61वें संविधान संशोधन द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। यह परिवर्तन अनुच्छेद 326 में संशोधन के माध्यम से किया गया। संसद द्वारा यह संविधान संशोधन अधिनियम 20 दिसंबर 1988 को पारित हुआ और 28 मार्च 1989 को प्रभावी हुआ। 


अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस


अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस प्रतिवर्ष 20 दिसंबर को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2005 में इसे घोषित किया, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर मानव एकता, समानता और साझा उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करना है। इसका उद्देश्य गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय और सतत विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करना है।


एडोल्फ हिटलर की रिहाई 


20 दिसंबर 1924 को, एडोल्फ हिटलर को 1923 के असफल बीयर हॉल पुट्स (तख्तापलट) के लिए राजद्रोह के मामले में नौ महीने की कैद के बाद लैंड्सबर्ग जेल से रिहा कर दिया गया था। जेल में रहते हुए उसने अपनी पुस्तक 'Mein Kampf' लिखना शुरू किया। रिहाई के बाद, उसने नाजी पार्टी को पुनर्गठित किया और 1933 में चांसलर बनने का मार्ग प्रशस्त किया।


भारतीय गोल्फ संघ की स्थापना 


Indian Golf Union (IGU) की स्थापना 20 दिसंबर 1955 को की गई थी। यह भारत में गोल्फ का सर्वोच्च राष्ट्रीय शासी निकाय है, जो नई दिल्ली में स्थित है। यह 194 से अधिक क्लबों के साथ देश में गोल्फ के विकास, अखिल भारतीय एमेच्योर/जूनियर टूर्नामेंटों के आयोजन, और अंतरराष्ट्रीय टीमों (एशियाई खेल) के चयन व प्रशिक्षण के लिए जिम्मेदार है। 


(विभिन्न स्रोतों पर आधारित)




शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

इतिहास : 13 दिसम्बर की महत्वपूर्ण घटनाएं

 


 • भारतीय संसद पर आतंकवादी हमला (2001)


13 दिसम्बर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े पाँच आतंकवादियों ने भारतीय संसद पर हमला किया। सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई में सभी आतंकी मार गिराए गए। इस घटना में दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ और संसद सुरक्षा के 9 कर्मियों सहित कुल 9-10 व्यक्तियों ने प्राण गंवाए। यह घटना भारत-पाक तनाव के चरम “ऑपरेशन पराक्रम” का कारण बनी।


डॉ. शरद कुमार दीक्षित का जन्म (1930)


13 दिसम्बर 1930 को पंढरपुर (महाराष्ट्र) में जन्मे डॉ. शरद कुमार दीक्षित अमेरिकी प्लास्टिक सर्जन और “द इंडिया प्रोजेक्ट” के संस्थापक थे। उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर रोगियों के लिए निःशुल्क प्लास्टिक सर्जरी सेवाएँ प्रदान कीं। मानव सेवा के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।


उपन्यासकार इलाचन्द्र जोशी का जन्म (1903)


प्रसिद्ध हिंदी मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार और समीक्षक इलाचन्द्र जोशी का जन्म 13 दिसम्बर 1903 को अल्मोड़ा में हुआ। ‘संन्यासी’, ‘परदे की रानी’ और ‘मुक्तिपथ’ जैसे उपन्यास उनके मनोविश्लेषणात्मक लेखन की प्रमुख कृतियाँ हैं। उनके जन्म वर्ष को लेकर कुछ स्रोतों में 1902–1903 का अंतर मिलता है, तथापि 13 दिसम्बर तिथि व्यापक रूप से स्वीकृत है।


अलबेरूनी का निधन (1048)


फ़ारसी विद्वान अल-बीरूनी (अलबेरूनी) का निधन 13 दिसम्बर 1048 को हुआ। वे विज्ञान, गणित, संस्कृत, भूगोल और तुलनात्मक संस्कृति-अध्ययन के अग्रणी माने जाते हैं। उनकी कृति “किताब-अल-हिंद” मध्यकालीन भारत का सबसे विस्तृत और विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत करती है।


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन प्रारंभ (1890)


13 दिसम्बर 1890 को कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन शुरू हुआ, जिसमें फ़िरोज़शाह मेहता अध्यक्ष बने। यह अधिवेशन ब्रिटिश भारतीय शासन में संविधानिक सुधारों और नागरिक अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण था।


संविधान सभा में उद्देशिका (Preamble) का प्रारूप स्वीकार (1946)


13 दिसम्बर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देशिका (Objectives Resolution) पेश की, जिसने स्वतंत्र भारत के संविधान की आधारभूत भावना और मूल्यों को निर्धारित किया। यही प्रस्ताव आगे चलकर संविधान की प्रस्तावना (Preamble) का आधार बना।


भारतीय नौसेना के पोत आईएनएस खुंखर को कमीशन (1989)


13 दिसम्बर 1989 को भारतीय नौसेना का गाइडेड मिसाइल विध्वंसक आईएनएस खुंखर (INS Khukri-2) सेवा में शामिल हुआ। यह “खुखरी वर्ग” का पहला युद्धपोत था, जिसने भारतीय नौसैनिक क्षमता को सुदृढ़ किया।


- ललित मानिकपुरी, छत्तीसगढ़ 



बुधवार, 10 दिसंबर 2025

इतिहास : 10 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं...

शहीद वीर नारायण सिंह


शहीद वीर नारायण सिंह बलिदान दिवस 


1857 के स्वातंत्र्य समर में अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अपना बलिदान देने वाले अमर क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह का नाम छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद के रूप में प्रतिष्ठित है। वे सोनाखान के जमींदार थे। उन्होंने 1856–57 के अकाल के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में पनपी अनाज जमाखोरी और औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। 10 दिसम्बर 1857 को उन्हें रायपुर के जय स्तम्भ चौक पर फाँसी दे दी गयी।


विश्व मानवाधिकार दिवस


'संयुक्त राष्ट्र संघ' की महासभा ने 10 दिसम्बर, 1948 को सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र को अधिकारिक मान्यता प्रदान की थी। तब से प्रत्येक वर्ष 10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। सामान्य शब्दों में 'मानवाधिकार' किसी भी इंसान की ज़िंदगी, आज़ादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है। 


अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार 


भारत के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को 1998 में अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। यह पुरस्कार उन्हें कल्याणकारी अर्थशास्त्र, सामाजिक विकल्प सिद्धांत और विकास अर्थशास्त्र में योगदान के लिए मिला था। वे अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय बने।


मैरी क्यूरी, पियरे क्यूरी को हेनरी बेकरेल के साथ नोबेल पुरस्कार 


1903 में आज के दिन पोलैंड-जन्मी फ्रांसीसी वैज्ञानिक मैरी क्यूरी और उनके पति पियरे क्यूरी को फ्रांसीसी वैज्ञानिक हेनरी बेकरेल के साथ रेडियोधर्मिता के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व शोध के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। मैरी क्यूरी नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली महिला बनीं और दो अलग-अलग विज्ञान क्षेत्रों (भौतिकी और रसायन) में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली एकमात्र वैज्ञानिक। 


- ललित मानिकपुरी, छत्तीसगढ़ 





शनिवार, 6 सितंबर 2025

मंकू बेंदरा अउ कपटी मंगर (छत्तीसगढ़ी कहानी)

मंकू बेंदरा अउ कपटी मंगर  (छत्तीसगढ़ी कहानी)

"खी खी खी... हूॅंप  हूॅंप..." अइसे अपन भाखा में मंकू बेंदरा के माँ हा मंकू बेंदरा ला किहिस कि - "चल बेटा उतर, चल-चल, हवा बहुत जोर से चलत हे। मौसम बिगड़त हे, कहूँ बने ठउर में जाबो!" 

फेर उतलइन मंकू बेंदरा हा पेड़ के अउ ठीलिंग में चढ़गे। हवा सनसनावत राहय। डंगाली एती ओती लहसत राहय। तेमा ओरम के मंकू हा झूले के मज़ा लेवत राहय। 

मंकू के माँ हा ओला धर के तीरे बर ऊपर डाहर चढ़े लगिस, तभे हवा अचानक जोर के आँधी बनगे। डारा रटाक ले टूट गे। आँधी में मंकू बेंदरा हा डारा सुद्धा नदिया डाहर फेंकागे। 

नदिया में मंगर हा मुँहूँ फारे ताकत राहय। ओहा बड़ दिन के जोंगत रिहिस कि, "एको दिन एको झन बेंदरा कहूँ गिर जतिस ते बढ़िया पार्टी मनातेंव!"

ओहा मने मन सोचय कि, "ये बेंदरा मन अतेक मीठ-मीठ जामुन खाथें त ऊॅंकर माॅंस में कतका सुवाद होही, अउ करेजा कतका सुहाही!" बेंदरा मन ला देख के ओकर लार टपक जाय। फेर अपन ये इच्छा ला मन में लुकाय ऊपरछवा ऊॅंकर हितवा-मितवा बने राहय। 

आज मंकू बेंदरा ला नदिया में गिरत देख के मंगर हा लपक गे। मंटू ला खाए बर अपन मुँहूँ ला जबर फार डरिस। लेकिन ऊपर ले गिरत-गिरत मंकू बेंदरा हा ओला देख डरिस। खतरा के अंदाजा होगे। पल भर में सोच डरिस कि कइसे बाँचे जाय। 

गिरत-गिरत मंकू बेंदरा हा मंगर के मुँहूँ में डारा ला ख़ब ले खोंस दिस। जामुन के डारा हा मंगर के टोटा के भीतरी के जावत ले अरझ गे। डारा के दूसर छोर ला कस के धरे मंकू बेंदरा हा मंगर के पीठ में गोड़ फाॅंस के‌ बइठ गे।‌ 

पीरा के मारे मंगर छटपटाय लगिस।‌‌ टोटा के भीतर के जात ले खुसेरे डारा ला उलगे के उदिम करय, फेर उलग नइ पाय। 

ओहा मंकू बेंदरा ला अपन पीठ ले गिराए के भारी उदिम करिस, फेर मंकू तो डारा ला कस के धरे राहय, अउ अपन दूनो पाँव ले घलो कस के फाॅंसे राहय। 

मंगर के‌ बड़ ताकत रिहिस। मंकू जानत रिहिस कि एक कनिक भी चूक होइस ते जीव नइ बाॅंचय। ओ पूरा सवचेत रिहिस। 

मंगर हा मंकू ला बुड़ोय बर गहिर पानी में उतरे लगिस। मंकू अकबकागे।‌ 

तभे मंकू‌ ला अपन माॅं के गोठ सुरता आगे कि, "मंगर मन हा पानी के भीतर में घलो बड़ बेरा ले साॅंस थाम के रहि जथें। लेकिन ऊॅंकर ऊपर जब अलहन बिपत आथे तब धुकधुकी में ओकर साँस तेज हो जथे। तब साँस लेबर ऊपर डाहर आए ला परथे!"

ये बात के सुरता करत मंकू बेंदरा हा मंगर के टोटा में फॅंसे डारा ला हलाय लगिस। मंगर हा पीरा में बायबिकल होगे। साँस लेबर ऊपर डाहर आइस, तब मंकू घलो साँस ले पाइस।‌ 

बड़ बेरा ले ऊंकर दूनों के बीच लड़ई चलत रिहिस। दूनों लस्त पर गें। मंगर ला घलो जानब होइस कि मोरो जीव छूट सकत हे। अइसे में समझौता करना ठीक रही। ओहा मंकू के हाथ-पाँव जोड़े लगिस। किहिस- "मोला माफी दे भाई, मोला छोड़ दे।"

मंकू किहिस - "तब तैं मोला मोर ठउर तक अमरा दे।"

मंगर हा चुपचाप ओला ओकर ठउर में लान दिस। मंकू हा मंगर के मुँहूँ ले डारा ला सूर्रत चप ले कूद के पेड़ में चढ़ गे। 

पेड़ के ऊपर ले मंगर ला किहिस - "तोर मुँहूँ में डारा ला अपन जीव बचाय बर खोंसे रहेंव संगी, तोर जीव लेना मोर मकसद नइ रिहिस। हमन तो तोला मया करत रोज मीठ-मीठ जामुन खवावन। अउ तैं हमर संग कपट करे।"

मोर माँ तो मोला पहिली ले मोला चेताय रिहिस कि - "बेटा काकरो संग बैर मत करबे, फेर काकरो ऊपर आँखी मूँद के भरोसा घलो झन करबे। मोर माँ मोला यहू सिखाय रिहिस कि, बिपत के बेरा घबराबे झन, हिम्मत देखाबे। आज मोर माँ के सीख मोला बचा लिस।" 

अइसे काहत मंकू अपन माँ ला पोटार लिस। अब आँधी थम गे रिहिस। 

✍️ ललित मानिकपुरी, महासमुंद 


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बुधवार, 3 सितंबर 2025

(छत्तीसगढ़ी कहानी) "उड़-उड़"

 

(छत्तीसगढ़ी कहानी) "उड़-उड़"

"चींव-चींव...चींव-चींव..." अइसे आरो देवत माई चिरई हा अपन पिला चिरई ला रहि-रहि के बलावत राहय। "आ न बेटा आ! आ उड़! उड़-उड़!" 

फेर पिला चिरई हा पहाड़ के खोलखा ले टस-ले-मस नइ होय। उड़ियाय बर अपन गोड़ ला उसाले ला धरय, त डर के मारे काँप जाय, अउ फेर मुरझुरा के बइठ जाय। 

ओकर मन में भारी डर हमा गे रिहिस। सोचय कि, "मैं कहूँ उड़ियाहूँ, त‌ खाल्हे डाहर खाई में गिर जहूँ, अउ नदिया में बोहा जहूँ। 

इही सोच-सोच के ओ पिला चिरई हा उड़ियाबे नइ करे। खोलखा ले मुड़ी निकाल के खाल्हे डाहर देखे के तको ओकर हिम्मत नइ होय। 

भलुक ओकर छोटे भाई-बहिनी मन नदिया के ओ पार दूसर खॅंड़ में मस्त खावत खेलत राहॅंय। दाई-ददा मन घलो अपन काम बुता में लगे राहॅंय। 

काम बुता करत-करत माई चिरई हा ओ पहाड़ के खोलखा डाहर देखय अउ "आ बेटा आ" कहिके आरो लगावय। 

तीन दिन पहिली सिर्फ वो पिला चिरई के छोड़ चिरई मन के पूरा परिवार हा पहाड़ के खोलखा ला छोड़ के उड़ियावत नदिया के दूसर खॅंड़ में आ गे राहॅंय। काबर कि, अब पहाड़ के खोलखा के जरूरत नइ रहि गे रिहिस। माई चिरई हा सुरक्षित ठउर में अंडा दे बर पहाड़ के वो ऊॅंच खोलखा ला चुने रिहिस। उन्हें अपन खोंधरा बनाए रिहिस।

जब ओकर जम्मो पिला मन अंडा फोर के निकल गें, त ऊॅंकर भूख मेटाए बर नदिया ले मछरी, कीरा-मकोरा निते दाना-दुनका अपन चोंच में चाप के खोलखा में लेगय, अउ नान-नान चीथ टोर के ओमन ला खवावय। 

जब पिला मन बड़े होगें अउ ऊॅंकर पाॅंख जाम गे, तब ओमन ला उड़े बर अउ खुद ले चारा चुगे बर सिखोय खातिर माई चिरई हा प्लान बनाए रिहिस। 

प्लान के मुताबिक वो खोलखा ला छोड़ के सब्बो झन ला एक्के संग उड़ियाना रिहिस। अउ उड़ियावत- उड़ियावत नदिया के ओ पार जाना रिहिस। 

माई के इशारा पाके सब्बो झन एक्के संग उड़िन। खोलखा ले उड़े के बाद बाकी सब चिरई मन उड़ते गिन उड़ते गिन, बस इही पिला के मन में भय हमा गे अउ ओहा तुरते लहुट के खोलखा में फेर हमागे। 

तब ले ओ पिला चिरई हा पहाड़ के खोलखा में बइठे बस टुकुट-टुकुर देखत राहय। अकेल्ला लाॅंघन-भूखन परे राहय। ओला आस रिहिस कि मम्मी हा पहिली जइसे चारा लान के खवाही। फेर तीन दिन होय के बाद भी ओकर मम्मी ओकर बर चारा दाना नइ लानिस।

भूख में पेट सोप-सोप करत राहय। खोलखा में बाँचे-खुॅंचे जउन भी खाय के रिहिस, ओला ओ खा डरे रिहिस। भूख के मारे अपनेच अंडा के फोकला ला घलो खा डरिस। 

अब तो भूख सहे नइ जावत रिहिस। चक्कर आए लगिस। ओला अइसे लागे लगिस कि अब तो प्राण नइ बाँचय। 

जिंदगी बचाना हे अउ जीना हे, त ओला खोलखा ले बाहिर निकलना परही। फेर, ओकर मन में अभीच ले डर बैठे हे। भूख में शरीर घलो कमजोर होगे हे। अइसन में ओ कइसे उड़ियाही? खाई ला कइसे पार करही? नदिया ला कैसे पार करही? 

ये चिंता माई चिरई ला होवत रिहिस। ओहा अपन पिला ला बचाना चाहत रिहिस, फेर ओला जीये के लायक भी बनाना चाहत रिहिस। 

माई चिरई हा नदिया के खॅंड़ ले उड़ान भरिस। नदिया के पानी में गोता लगावत चोंच में मछरी चाप के निकलिस। अउ सनसन-सनसन उड़ियावत पहाड़ खोलखा डाहर निकल गे। 

अपन मम्मी ला आवत देख के खोलखा में बइठे पिला चिरई के मन हरिया गे। देखिस कि, मम्मी हा मोर खाए बर मछरी लानत हे, त ओकर खुशी के ठिकाना नइ रिहिस। 

फेर देखथे कि, ओकर मम्मी खोलखा मेर आके अचानक रुक गे। चोंच में मछरी चपके हे, फेर खोलखा में आवत नइ हे। 

ओ हा तुहनू देखाय कस खोलखा तिर आइस, तभे पिला चिरई हा मछरी ला खाए बर अपन चोंच ला लमावत जइसे आगू डाहर सलगिस, माई चिरई हा तुरते पाछू घुॅंच गे। 

अब पिला चिरई हा खोलखा ले उलन के खाई में गिरे लगिस। गिरत-गिरत अपन मम्मी डाहर बचाही कहिके देखथे, त ओकर मम्मी हा ओला ओकर हाल में छोड़ के ऊपर डाहर उड़ागे। 

पिला चिरई ला लगिस कि अब तो वो बस मरने वाला हे। तभे ओला जनइस, ये एहसास होइस कि ओकर जम्मो पाँख मन फरिया गे हें। ओहा जोरदार साँस लिस, अपन छाती में हवा भरिस, अउ पंख मन ला फड़फड़ाना शुरू करिस। गिरत रिहिस ते हा हवा में थम गे। फेर ऊपर उठे लगिस। उड़े लगिस। 

तभे वो देखिस कि ओकर मम्मी, पापा, भाई, बहिनी सब्बो झन ओकर आजू बाजू उड़त राहॅंय।‌ ओमन ओकर हौसला बढ़ाये बर आए राहॅंय। 

ओमन ला देख के‌ ओ पिला चिरई घलो मगन होके उड़े लगिस। नदिया के पानी में खेले लगिस। पानी तरी बुड़ के टप ले मछरी बिन डरिस। 

भूख-प्यास मेटाए के बाद वो हा जमके उड़े लगिस, आसमान में गोता लगाए लगिस। वो हा अब जान डरिस कि वो पंछी आय। 

✍️ ललित मानिकपुरी 


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रविवार, 24 अगस्त 2025

देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा...




* अच्छी फसल की कामना का लोकपर्व 'भोजली'

* छत्तीसगढ़ में अटूट मैत्री परंपरा का प्रतीक भी है


देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा वो, लहर तुरंगा,

हमरो भोजली दाई के भिजे आठो अंगा...


सावन के महीने में अगर आप छत्तीसगढ़ के गांवों में आपको यह गीत सुनने को जरूर मिल जाएगा। जो कि 'भोजली' गीत के रूप में प्रचलित है। छत्तीसगढ़ का यह पारंपरिक गीत 'भोजली देवी' को समर्पित है। सावन के महीने में मनाया जाने वाला भोजली का त्यौहार हरियाली और उल्लास का प्रतीक है।  



सावन में रिमझिम बारिश की बूंदें अपनी प्रकृति का पोषण करती हैं, इसी समय प्रकृति हरी चादर ओढ़कर सभी में हर्ष और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। तब कृषक अपने खेती के कामों से थोड़ा समय निकालकर गांवों के चौपालों में सावन का आनंद लेते हैं और इसी समय अनेक लोक पर्वों का आगमन होता है। जिनमें से एक है 'भोजली' का त्यौहार। 


छत्तीसगढ में सावन महीने की नवमी तिथि को छोटी-छोटी टोकरियों में मिट्टी डालकर उनमें गेहूं के दाने उगाए जाते हैं। ऐसी कामना की जाती है, कि- ये दानें जल्दी ही भोजली फसल के रूप में तैयार हो जाएं। जिस तरह भोजली एक सप्ताह के भीतर खूब बढ़ जाती है, उसी तरह खेतों की फसलें भी दिन-दूनी, रात-चौगुनी बढ़े और किसान संपन्नता की ओर बढ़े। भोजली का त्यौहार ये उम्मीद देता है, कि इस बार फसल लहलहायेगी और इसीलिए ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं और लड़कियां सुरीले स्वरों में भोजली सेवा लोकगीत गाती हैं। 



भोजली को घर के किसी पवित्र और छायेदार जगह में उगाया जाता है। भोजली के ये दाने धीरे-धीरे पौधे बनते हैं। नियमित रूप से इनकी पूजा और देखरेख की जाती है। जिस तरह देवी के सम्‍मान में वीरगाथाओं को गाकर जंवारा-जस-सेवा गीत गाए जाते हैं, उसी तरह ही भोजली दाई के सम्‍मान में भोजली सेवा गीत गाये जाते हैं। 


भादो कृष्ण पक्ष प्रतिपदा के दिन भोजली का विसर्जन होता है। भोजली विसर्जन को गांवों में बड़े ही धूम-धाम से सराया जाता है। सराना यानी कि पानी में भोजली को बहाना। ग्रामीण महिलाएं और  बेटियाँ भोजली को अपने सिर पर रखकर विसर्जन के लिए गीत गाती हुई गांवों में घूमती हैं। इस दौरान भजन, सेवा और स्थानीय रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। सेवा टोलियां मण्डली के साथ गाना-बजाना करते हुए भाव पूर्ण स्वर में भोजली गीत गाती हुई तालाब या नदी की ओर प्रस्थान करती हैं।



नदी अथवा तालाब जहां भोजली को विसर्जित किया जाना होता है, वहां के घाट को पानी से भिगोकर पहले शुद्ध किया जाता है। फिर भोजली को वहां रखकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। जिसके बाद भोजली को जल में विसर्जित किया जाता है। विसर्जन के बाद कुछ मात्रा में भोजली की फसल को टोकरी में रखकर वापस आते समय मन्दिरों में चढ़ाते हुए घर लाया जाता है।


छत्तीसगढ़ में भोजली का त्यौहार रक्षा बंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है। जहां एक तरफ 'भोजली' छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक मान्यताओं का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक रीति-रिवाजों की खूबसूरती भी है। इसे मित्रता की मिसाल भी मानी जाती है। दरअसल भोजली का महत्व सिर्फ विसर्जन तक ही नहीं होता है। भोजली की फसल का आदान-प्रदान कर भोजली बदी जाती है। भोजली बदना यानी कि दोस्ती को जीवन भर निभाने का संकल्प लेना। 



छत्तीसगढ़ में भोजली बदने की परंपरा के तहत दो मित्र भोजली की बालियों को एक-दूसरे के कान में खोंचकर लगाते हैं। इसे ही ‘भोजली’ अथवा ‘गींया’ (मित्र) बदने की प्राचीन परंपरा कही जाती है। ऐसी मान्यता है कि जिनसे भोजली अथवा गींया बदा जाता है उसका नाम जीवन भर अपनी जुबान से नहीं लेते हैं। छत्तीसगढ़ में ये मित्र को सम्मान देने की एक खूबसूरत प्रथा है। तो अगर दोस्त का नाम नहीं लेते हैं तो उन्हें संबोधित कैसे किया जाता है। दरअसल भोजली बदने के बाद मित्र को 'भोजली' अथवा 'गींया' कहकर पुकारा जाता है। 


मित्रता के इस महत्व के अलावा भोजली को घरों और गांव में अपने से बड़ों को भोजली की बाली देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। साथ ही अपने से छोटों के प्रति अपना स्नेह प्रकट करना भी भोजली सिखाता है। 


छत्तीसगढ़ के त्यौहार जहां विविधता और आदिम परंपराओं के द्योतक हैं तो वहीं ये कहीं न कहीं लोगों को प्रकृति से जोड़ते हैं, उनका महत्व बताते हैं, कि कैसे प्राकृतिक संसाधन और प्रकृति हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। भोजली पर्व भी उनमें से एक है। जिसका निर्वहन आज भी पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाता है।

✍️ ललित मानिकपुरी, महासमुंद (छत्तीसगढ़)


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मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

आदिवासी महापर्व 'खे-खेल बेंजा' 'खद्दी परब' 'सरहुल'


जीवन का आधार 'धरती' और ऊर्जा के परम स्रोत 'सूर्य' के विवाह का महा-उत्सव : खे-खेल बेंजा 


इस समय आदिवासी अंचलों में हर्ष और उल्लास का वातावरण है, क्योंकि आदिवासी परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व धरती पूजन 'खद्दी परब' के साथ पारंपरिक मेलों की धूम है। छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियों में शुमार उरांव जनजाति की बोली यानी कुडुख बोली में 'खद्दी परब' या 'खेखेल बेंजा' का आशय होता है 'धरती का विवाह'। इस आदिम परंपरा से पता चलता है कि आदिवासी समाज प्रकृति से कितना गहरा नाता रखता है और इस नाते को जीवंत बनाए रखने के लिए भी किस तरह चैतन्य व समर्पित है। 


आदिवासी मानते हैं कि धरती जीव-जगत का आधार है। हमें अन्न, जल, फल-फूल धरती से ही मिलते हैं। पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों, झरनों का सुख भी धरती ही है। धरती की अनुकंपा से ही जीवों का जीवन चलता है। इस अनुकंपा के लिए धरती के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव वक्त करने के लिए यह महा उत्सव कहीं खद्दी परब, कहीं सरहुल या कहीं अन्य नाम से हर वर्ष मनाया जाता है।


पतझड़ के बाद जब प्रकृति पुनः फलने-फूलने के लिए तैयार हो रही होती है, जब नए कोपलों, नई कलियों से पेड़-पौधों का नवश्रृंगार हो रहा होता है, जब जंगल रंग-बिरंगे फूलों और उनकी महक से भरा होता है, जब बसंती बयार नए फलों की आमद का संकेत दे रही होती है, तब प्रकृति से अभिन्न वनवासी, आदिवासी समाज 'धरती पूजन' का अपना महापर्व मनाता है। यह महापर्व देश के अलग-अलग आदिवासी अंचलों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में यह खद्दी परब या खे-खेल बेंजा नाम से जाना जाता है। 


यहां यह पर्व चैत्र के महीने में मनाया जाता है, जब जंगल में सरई के पेड़ फूलों से लद जाते हैं। आदिवासी परंपरा के अनुसार माटी यानी धरती और सरई वृक्ष की पूजा की जाती है। जीवन का आधार उर्वर धरती और ऊर्जा के परम स्रोत सूर्य के विवाह का प्रतीकात्मक आयोजन किया जाता है। धरती और सूर्य के मांगलिक मेल से ही जीवन संभव और सुखद हो सकता है। यह पर्व मानव जीवन का प्रकृति के साथ जीवंत रिश्तों को बरकरार रखने और प्रकृति की रक्षा के लिए संकल्पित होने का पर्व है। 


छत्तीसगढ़ में बस्तर, सरगुजा, जशपुर अंचल में यह पर्व महा उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिसमें उरांव जनजाति की विशेष भूमिका के साथ सर्व आदिवासी समुदाय तथा वहां के निवासी अन्य जातियों के खेतिहर किसानों की भी सहज सहभागिता होती है। अपनी पुरातन पर्व परंपराओं से आदिवासी समाज प्रकृति की परवाह करने की सीख हजारों साल से दुनिया को दे रहा है।  


• आलेख - ललित मानिकपुरी, रायपुर (छत्तीसगढ़)


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बुधवार, 19 मार्च 2025

कुहकी डंडा नृत्य "Kuhki" an amazing folk dance of India which is only left in a village of Chhattisgarh





आपने देखा है, "कुहकी डंडा नृत्य" कैसे होता है? यह भारत के प्राचीन लोक नृत्यों में से एक है, जो अब विलुप्त होने के कगार पर है। मैं यहां जानबूझकर "विलुप्त" शब्द का उपयोग कर रहा हूं, क्योंकि जीवंतता लोकनृत्यों में भी होती है। 


पूरे मध्य भारत में छत्तीसगढ़ के बिरकोनी जैसे कुछ ही ग्राम ऐसे हैं जहां कुहकी डंडा लोकनृत्य की परंपरा आज भी चली आ रही है। पशुपालक कृषकों द्वारा फागुन त्यौहार के अवसर पर यह नृत्य किया जाता है।


बिना किसी वाद्य यंत्र के केवल कंठ से निकलने वाली आवाज़ "कुहकी" और डंडों के टकराने की ध्वनि से ही इस नृत्य के लिए संगीत उपजता है। डंडों की चाल और ताल के साथ नृत्य की गति जैसे-जैसे तेज होती जाती है, नर्तन वृत्त पर ऐसा अद्भुत रोमांचकारी दृश्य उत्पन्न होता है कि नजरें टिकी रह जाती हैं। 


नृत्य करने वाले ही नृत्य के साथ-साथ गीत भी गाते चलते हैं। ये गीत लोकभाषा में होते हैं, फूहड़ कतई नहीं। इन गीतों में जीवन के हर्ष, विषाद और जीव की परम् गति शब्दों से उच्चारित होती है और यही भाव-दृश्य नृत्य आवृत्त में भी परिलक्षित होता है। 


हमारे गांव बिरकोनी के कृषक सियानों ने इस लोकनृत्य को सहेज कर रखा है। वे चाहते हैं कि नई पीढ़ी भी इस लोकनृत्य में रुचि ले, इसे आगे बढ़ाए। 


पांच पीढ़ियों से संभाले हुए हैं : 

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बिरकोनी गांव के सियानों ने विलुप्ति के कगार पर पहुंचे पारंपरिक कला कुहकी डंडा नृत्य को पांच पीढ़ियों से संभाले रखा है। 


कंठ से निकली आवाज़ ही "कुहकी"

कुहकी डंडा नृत्य कला व परंपरा का अदभुत संगम है। कुहकी डंडा नृत्य एक ऐसा नृत्य है, जिसमें कंठ से निकाली जानी वाली विशिष्ट आवाज "कुहकी" से ही नृत्य की लय, गति और डंडे की चाल बदल रहती है।


100 से चली आ रही यह नृत्य परंपरा : 

100 सालों से फागुन त्यौहार के अवसर पर इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। गांव में यह नृत्य कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलती रही है। फागुनी माहौल में कुहकी कलाकारों का उत्साह और इस नृत्य का वास्तविक सौंदर्य दिखाई पड़ता है। 


सभी नृत्य कलाकार 60 साल पार : 

कुहकी नृत्य करने वाले अधिकतर 60 साल के ऊपर के हो चले हैं। वे नई पीढ़ी को यह कला सिखाना और इस नृत्य परंपरा को आगे बढ़ाना चाहते हैं। किंतु नई पीढ़ी रुचि नहीं ले रही है। 


8 या 10 व्यक्ति का होना जरूरी : 

बुजुर्ग कलाकार बताते हैं कि कुहकी नृत्य में डंडा चालन के लिए 8 या 10 व्यक्ति का होना जरूरी है। प्रत्येक नर्तक के हाथ में एक या दो डंडा होता है। नृत्य का प्रथम चरण ताल मिलाना है। दूसरा चरण कुहकी देने पर नृत्य चालन और उसी के साथ गायन होता है। नर्तक एक-दूसरे के डंडे पर डंडे से चोट करते हैं। डंडों की समवेत ध्वनि से अल्हादकारी संगीत उपस्थित होता है। 


कुहकी के भी कई रूप : 

कुहकी नृत्य भी अनेक प्रकार का होता है। छर्रा, तीन टेहरी, गोल छर्रा, समधीन भेंट और घुस। अभी बिरकोनी के सियान छर्रा और तीन टेहरी का प्रदर्शन करते हैं। फागुन त्यौहार के अवसर पर इसका आनंद लेने हजारों की भीड़ लगी होती है। 


क्या कहते हैं सियान : 

गांव के लोक कलाकार बुधारू निषाद बताते हैं कि 10 साल की उम्र से ही होली के अवसर पर कुहकी नृत्य करते आ रहे हैं। हमारे पुरखों ने इस सांस्कृतिक कला की नींव रखी थी। उसे हमने आगे बढ़ाया। वर्तमान में 8-10 लोग ही कुहकी डंडा नृत्य करते हैं। नई पीढ़ी इसमें रुचि ले तो यह लोक नृत्य आगे भी जिंदा रहा सकता है। इसके गीत भी मधुर और भक्ति भाव से भरे होते हैं। 


क्या है कुहकी : 

कुहकी नृत्य में एक व्यक्ति गले से एक अलग तरह की आवाज निकालता है। इस आवाज से नृत्य की लय व डंडे की चाल बदलती है। आवाज से इशारा मिलने पर नर्तक नृत्य का तरीका बदलने के साथ आगे-पीछे घूमकर डंडे से डंडे पर चोट करते हैं।


बिना साज अद्भुत नृत्य : 

कुहकी नृत्य में एक विशिष्ट बात यह है कि इस नृत्य के दौरान कोई भी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं किया जाता। नर्तकों के डंडों की चोट की समवेत ध्वनि और कुहकी की आवाज से बिना साज ही संगीत सी लहर दौड़ने लगती है। 


पशुपालक कृषकों का नृत्य : 

कुहकी डंडा नृत्य छत्तीसगढ़ के पशुपालक कृषकों का पारंपरिक नृत्य है, पहले कृषि और पशुपालन करने वाले ग्रामीण प्रायः हाथों में डंडे लेकर चलते थे। फागुनी उमंग में डंडों से ही संगीत की तरंग निकाल लेते थे। इस नृत्य का किसी जाति विशेष से कोई संबंध नहीं है। हां यह नृत्य केवल पुरुष ही करते हैं। इस नृत्य में तीव्र डंडा चालन जोखिम भरा होता है। 


✍️ललित मानिकपुरी, 

बिरकोनी, महासमुंद (छत्तीसगढ़)


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