बुधवार, 2 सितंबर 2026

कमरछठ : कथाओं से आगे, जीवन और प्रकृति का लोकपर्व


यह कैसे संभव है कि लोहे के मजबूत धारदार हलफाल की सांघातिक चोट से मृत नवजात शिशु फिर से जीवित हो जाए? यह कैसे संभव है कि जिस बालक को आग में झोंककर मार दिया गया हो, वह फिर से खेलता हुआ लौट आए? यह कैसे संभव है कि जिन बच्चों को मारकर जंगल में फेंक दिया गया हो, वे वहाँ खेलते मिल जाएँ? यह कैसे संभव है, तालाब में बलि दिया हुआ बालक अरसे बाद फिर से जीवित लौट आए? यह कैसे संभव है कि किसी घातक अस्त्र के प्रयोग से गर्भ में ही मिटने लगा शिशु पुनर्जीवन पा जाए, वह भी केवल एक व्रत रखने से? 


यह सवाल मेरे नहीं हैं? आज हर बात पर सवाल करने वाली नई पीढ़ी जिसे मौजूदा वक्त में जेन-जेड और जेन अल्फा पुकारा जा रहा है, वह हलषष्ठी व्रत की कथाओं को सुनकर क्या ऐसे सवाल नहीं करेगी? करेगी, लेकिन सवाल उठाने से हलषष्ठी व्रत की कथाएँ बदल नहीं जाएंगी। जेन-जेड और जेन अल्फा को सवाल पूछने से रोकना भी नहीं चाहिए, बल्कि उनके सवालों का हमारे पास माकूल जवाब होना चाहिए। और अगर जवाब नहीं है तो उन्हें जवाब ढूँढ़ने देना चाहिए। 


मैं यहाँ हलषष्ठी व्रत की कथा नहीं सुनाऊंगा। रोचक कथाओं की पूरी श्रृंखला है, जिसे आम तौर पर हलषष्ठी का व्रत करने वाली महिलाएँ ही सुना करती हैं, पुरुषों की इसमें कोई विशेष रुचि नहीं होती? ऐसे में नई पीढ़ी के ऐसे संभावित प्रश्नों का जवाब भी उनके पास कम ही होता है। ऐसे में माताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। 


और यही बात हलषष्ठी व्रत का मूल है। अपनी संतति के लिए माताओं की भूमिका। सभी जानते हैं यह व्रत माताएँ अपनी संतान के दीर्घायु और कुशलता की कामना से करती हैं। किसी बालक को अपनी माँ की इस भावना से ऐतराज कैसे हो सकता है? और माँ केवल कामना ही नहीं करती, वह अपने बच्चों की कुशलता और दीर्घ जीवन के लिए पूरा यत्न भी करती है। वह अपने समर्पण से सिद्ध करती है कि वास्तव में माँ क्या होती है। यानी नई पीढ़ी को वह माँ होना भी सिखाती है। 


ममता का कमरछठ से गहरा संबंध है। इसकी कथाएँ नई पीढ़ी को अविश्वनीय जरूर लग सकती हैं, लेकिन इन कथाओं का अपना महत्व है। कथाएँ आस्था को मजबूत करती हैं और आस्था लोक संस्कृति व परम्पराओं को सींचती है। और लोक संस्कृति व परम्पराएँ सर्व हितकारी गूढ़ संकेतों और संदेशों का संवाहक होती हैं। इनमें ऐसी कई बातें छिपी होती हैं, जिनका सीधा संबंध जीवन और जीवन आधार से होता है। 


समाज आज जितना शिक्षित और जागरूक है, कल उतना नहीं था। बल्कि, समाज की आधी आबादी यानी महिलाएँ शिक्षा के प्रकाश से लगभग वंचित ही थीं। जबकि वे ही परिवार का आधार होती हैं। कथाओं के जरिए उन्हें आस्थापूर्वक अपनी संस्कृति व परम्पराओं से जोड़ना सरल उपाय था। हालाँकि समय के साथ विकृतियाँ आ ही जाती हैं और कई परम्पराएँ जो लोक कल्याण के भाव से शुरू हुई होती हैं, आगे चलकर विचित्र और हास्यास्पद लगने लगती हैं। 


हल षष्ठी जिसे छत्तीसगढ़ की लोक भाषा में कमरछठ, खमरछठ भी कहा जाता है, उसकी व्रत पूजा परम्परा, बड़ी रोचक है। यदि इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान मानें तो इस पर कुछ कहने की जरूरत ही नहीं। और न ही एक धार्मिक विषय पर मैं कुछ कहने चाहता हूँ। किसी की भी आस्था को ठेंस पहुँचाना मेरा इरादा नहीं है। मेरी रुचि इस पूजा के विधान और इसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री पर अधिक है। इनमें गौर करने से ऐसा लगता है छत्तीसगढ़ की अनेक लोक परंपराओं की तरह इस पूजा परम्परा में भी गहरे संकेत छिपे हुए हैं। 


कमरछठ पूजा के लिए गड्ढे खोदकर दो सगरी बनाए जाते हैं, यह जलाशय का प्रतीक हैं। दोनों सगरी के बीच छेद होती है। जब जल अर्पण किया जाता है तो दोनों सगरी में जल बराबर मात्रा में पहुँचता है। संदेश तो साफ है, जल ही जीवन का आधार है। तालाब, पोखर और अन्य जलस्रोतों का संरक्षण आवश्यक है। साथ ही जल पर किसी का एकाधिकार न हो। समान रूप से उपलब्धता हो। गाँव का जीवन केवल मनुष्य नहीं, बल्कि जल, वनस्पति और जीव-जंतुओं के सहजीवन पर टिका होता है। 


यह सगरी क्षेत्र जो पूजा स्थल होता है, उसे काश यानी कुश से सजाया गया होता है, जिसके फूल पककर सफेद हो चुके होते हैं। यह उस बात का प्रतीक है कि, पुरखों ने अपना जीवन तपाकर जो ज्ञान और समझ अर्जित की है, वह यहाँ स्पष्ट संकेतों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया जा रहा है। इसे नहीं समझे तो, इसका कोई महत्व भी नहीं। 


इस पर्व की सबसे विशिष्ट वस्तुओं में पसहर चावल शामिल है। इस पर्व परंपरा में हल से जोते गए खेत के अन्न से परहेज कर प्राकृतिक अथवा बिना हल जोती भूमि से प्राप्त खाद्य सामग्री को महत्व दिया जाता है। यह धरती और प्राकृतिक उत्पादन के प्रति सम्मान। संदेश यह है कि, मनुष्य को प्रकृति पर पूर्ण अधिकार जताने के बजाय उसके साथ संतुलन बनाकर जीना चाहिए।


पसहर भात के साथ अलग-अलग छह प्रकार की भाजियाँ ग्रहण की जाती हैं। यह स्थानीय और मौसमी होती हैं। विटामिन्स और पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। औषधीय गुणों वाली होती हैं। इस पर्व के आहार के बहाने माताओं तक पारंपरिक रूप से यह ज्ञान तो पहुँचता ही है कि, हमारे आसपास स्थानीय स्तर पर सहज रूप से उपलब्ध वनस्पतियाँ भी हमारे परिवार के पोषण में उपयोगी हो सकती हैं। इस पर्व की आवश्यक सामग्री के बहाने कम से कम इतनी पौष्टिक भाजियों के बीज पीढ़ियों के लिए संरक्षित तो रहेंगे। 


इस पर्व में महुआ और उसके पत्तों से बने दोना, पत्तल का उपयोग होता है। महुआ छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और वनवासी जीवन का महत्वपूर्ण वृक्ष है। पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि भोजन, आजीविका और संस्कृति के स्रोत होते हैं। स्थानीय जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक है। जंगल और मनुष्य का संबंध सहजीवन का है। महुआ पत्तों के दोना-पत्तल का उपयोग विशेष रूप से प्राकृतिक और जैविक जीवनशैली की भी प्रेरणा देता है।


इस पर्व में भैंस का दूध-दही उपयोग में लाया जाता है, गाय का वर्जित होता है। मान्यता चाहे जो भी हो, लेकिन यह साफ है कि भारतीय ग्रामीण जीवन में गाय की धार्मिक प्रतिष्ठा अधिक है। गौ को माता कहा जाता है। पहले गायें बहुतायत से और घर-घर होती थीं। लेकिन कमरछठ में भैंस को विशेष स्थान मिलना यह संकेत देता है कि भैंस भी ग्रामीण परिवार की अर्थव्यवस्था और पोषण का महत्वपूर्ण आधार है। इस आधार को बनाए रखना भी जरूरी है। दूध, दही और घी पोषण के पारंपरिक स्रोत रहे हैं। पशुधन ग्रामीण परिवार की संपत्ति और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मनुष्य और पशु का संबंध केवल उपयोग का नहीं, बल्कि पारिवारिक और आर्थिक सहजीवन का है। 


इस पर्व में धान की लाई प्रयोग में लाई जाती है। सरल और स्थानीय खाद्य पदार्थों में भी पोषण एवं संस्कृति का मूल्य निहित है। 


पोता लगाना, इस पर्व का सबसे अहम विधान है। पूजा के बाद बच्चों की कमर या पीठ पर पीली छुई में भिगोए कपड़े आदि से पोता लगाने की परंपरा है। दिन भर उपवास रखकर और आस्था पूर्वक पूजा कर माँ अपने बच्चों पर इसी तरह आशीष बरसाती है। यह माँ की स्नेह भरी थप्पी होती है, जिसमें संतान के प्रति मंगलकामना निहित होती है। वह स्वस्थ रहे, सुखी रहे, दीर्घायु हो। 

लोकविश्वास में इसे बच्चे के लिए मातृ-सुरक्षा या रक्षा-कवच का प्रतीक माना जाता है। यह परिवार में माँ की संरक्षक भूमिका का प्रतीकात्मक दर्शन है। 


वह माँ अपने बच्चे को आशीष के रूप में जब पोता देती है, तब उसके हाथ में, उस पोता में पीली मिट्टी की भीनी परत होती है। मिट्टी धरती माँ का रूप है। यानी, एक माँ अपने बच्चे के लिए अपनी धरती माँ से भी आशीष ले आती है। वह जानती है कि धरती ही हम सबकी असली माँ है। इसकी ही गोद में जीवन है। हम अपनी इस धरती, इस माटी को मान दें। इस माटी पर उपजी वनस्पति, इस माटी पर पलने वाले समस्त प्राणियों, जीव-जंतुओं की रक्षा करें। इसके पर्यावरण की रक्षा करें। इसमें पलने वाली विविध संस्कृतियों का सम्मान करें। 


यह बातें कोई शास्त्रीय विधानों का व्याख्यान नहीं है, बल्कि एक स्थानीय पर्व पूजा परम्परा में छिपे संदेशों का अनुमान लगाने और समझने का प्रयास है। 


सीधे सरल अर्थों में, मेरी दृष्टि में कमरछठ की पूरी परंपरा तीन बड़े संदेश देती है- “प्रकृति बचाओ, स्थानीय प्राकृतिक आहार अपनाओ और बच्चों के भविष्य की वास्तविक चिंता करो।”


इस लोकपर्व में जल के लिए सगरी, धरती के लिए पसहर, जैव विविधता के लिए छह भाजियाँ, जंगल के लिए महुआ, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए पशुधन और मातृत्व के लिए पोता, ये सभी एक साथ दिखाई देते हैं।


इसलिए कमरछठ को केवल संतान की दीर्घायु का व्रत कहना अधूरा होगा। यह छत्तीसगढ़ के पारंपरिक जीवन-दर्शन का भी सुंदर उदाहरण है- "मनुष्य, प्रकृति, जल, अन्न, पशु और परिवार के बीच संतुलन का लोकपर्व।"


आलेख- ✍️ ललित मानिकपुरी, महासमुंद (छत्तीसगढ़)


मंगलवार, 6 जनवरी 2026

आज का इतिहास : 6 जनवरी

 


छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा सूरत पर आक्रमण

6 जनवरी 1664 को महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगल साम्राज्य के प्रमुख व्यापारिक केंद्र सूरत पर आक्रमण किया। यह मुगल प्रशासन और समृद्ध व्यापारिक वर्ग के विरुद्ध मराठा शक्ति प्रदर्शन की महत्वपूर्ण घटना थी। 


•  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विभाजन की स्वीकृति

6 जनवरी 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने भारत के विभाजन को स्वीकार किया। यह निर्णय ब्रिटिश भारत के स्वतंत्रता एवं विभाजन की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने।


•  इंदिरा गाँधी हत्या मामले में दोषियों को फाँसी

6 जनवरी 1989 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के दोषी सतवंत सिंह और केहर सिंह को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी दी गई। इंदिरा गाँधी की हत्या 31 अक्टूबर 1984 को हुई थी।


•  भारत-ब्रिटेन ‘नई दिल्ली घोषणा-पत्र’ पर हस्ताक्षर

6 जनवरी 2002 को भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के बीच वार्ता के बाद नई दिल्ली घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। इसका उद्देश्य द्विपक्षीय सहयोग, आतंकवाद विरोधी प्रयास और रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ करना था।


6 जनवरी को जन्मे प्रमुख व्यक्तित्व

• 1959 — कपिल देव

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान, जिन्होंने 1983 में भारत को पहला क्रिकेट विश्व कप दिलाया। वे टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट लेने वाले पहले खिलाड़ी हैं। 

1966 — ए. आर. रहमान

प्रसिद्ध भारतीय संगीतकार और गायक। उन्हें दो ऑस्कर पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।


6 जनवरी को इनका निधन हुआ -

1885 — भारतेंदु हरिश्चंद्र

आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रवर्तक। उन्होंने 'अंधेर नगरी', 'भारत दुर्दशा' जैसे नाटक लिखे तथा 'हरिश्चंद्र मैगज़ीन' और 'कविवचन सुधा' जैसी पत्रिकाएँ प्रारंभ कीं।

1316 — अलाउद्दीन खिलजी

दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश के सुल्तान। उनकी मृत्यु के बाद उनके अल्पवयस्क पुत्र शहाबुद्दीन उमर को उत्तराधिकारी घोषित किया गया।

 

शनिवार, 3 जनवरी 2026

आज का इतिहास : 3 जनवरी की महत्वपूर्ण घटनाएं


• ‘स्टार्ट द्वितीय’ परमाणु संधि पर हस्ताक्षर

अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश और रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने 3 जनवरी 1993 को START-II (Strategic Arms Reduction Treaty-II) पर हस्ताक्षर किए। इस संधि का उद्देश्य शीत युद्ध के बाद दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों में भारी कटौती करना था। यद्यपि यह संधि पूरी तरह लागू नहीं हो सकी, फिर भी इसे परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जाता है।

शांति निकेतन में ‘ब्रह्मचर्य आश्रम’ की स्थापना

 गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 3 जनवरी 1901 को पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में 'ब्रह्मचर्य आश्रम' की स्थापना की। यह आश्रम प्रकृति के सान्निध्य में शिक्षा देने की एक अभिनव पहल थी, जिसने आगे चलकर 'विश्व-भारती विश्वविद्यालय' का रूप लिया। यह भारतीय शिक्षा-दर्शन में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है।


आज इनकी जयंती है -

सावित्रीबाई फुले जी

महान समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले जी का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगाँव में हुआ था। वे भारत की पहली महिला शिक्षिका, प्रखर नारीवादी चिंतक और मराठी भाषा की पहली कवयित्री थीं। उन्होंने अपने पति महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर बालिकाओं, दलितों और वंचित वर्गों की शिक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया। 

जसवंत सिंह जी

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह जी का जन्म 3 जनवरी 1938 को बाड़मेर राजपूताना में हुआ था। उन्होंने भारत सरकार में विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। 


आज इनकी पुण्यतिथि है -

• सावित्रीबाई फुले जी

महान समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले जी का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगाँव में हुआ था। वे भारत की पहली महिला शिक्षिका, प्रखर नारीवादी चिंतक और मराठी भाषा की पहली कवयित्री थीं। उन्होंने अपने पति महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर बालिकाओं, दलितों और वंचित वर्गों की शिक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया। 

मोहन राकेश जी

आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख स्तंभ, लेखक और नाटककार मोहन राकेश जी का निधन 3 जनवरी 1972 को हुआ। वे नई कहानी आंदोलन के अग्रणी रचनाकारों में थे। ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ जैसे उनके नाटक हिंदी रंगमंच की अमूल्य धरोहर हैं।

• डॉ. सतीश धवन जी

भारत के महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक और इसरो के तीसरे अध्यक्ष डॉ. सतीश धवन का निधन 3 जनवरी 2002 को हुआ। उनके नेतृत्व में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को वैज्ञानिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित भारत का अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र उनके ही नाम पर रखा गया है।

एम. एस. गोपालकृष्णन जी

भारत के प्रसिद्ध वायलिन वादक एम. एस. गोपालकृष्णन का निधन 3 जनवरी 2013 को हुआ। वे कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों संगीत परंपराओं में समान रूप से दक्ष थे और भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने वाले महान कलाकारों में गिने जाते हैं।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

आज का इतिहास : 2 जनवरी की महत्वपूर्ण घटनाएं

 


कलकत्ता पर ब्रिटिशों का पुनः कब्ज़ा

रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 2 जनवरी 1757 को नवाब सिराजुद्दौला से कलकत्ता (अब कोलकाता) वापस छीन लिया। इसके बाद 9 फरवरी 1757 को अलीनगर की संधि हुई। इसी घटनाक्रम के कुछ महीनों बाद 23 जून 1757 को प्लासी का युद्ध लड़ा गया, जिसने बंगाल में ब्रिटिश राजनीतिक प्रभुत्व की नींव रखी।


चंद्रमा की पहली तस्वीर

1839 में इसी दिन फ्रांसीसी फोटोग्राफर लुई दागुएरे ने चंद्रमा की पहली सफल फोटोग्राफिक छवि प्रदर्शित की। यह चित्र उनकी विकसित की गई दागुएरियोटाइप तकनीक से लिया गया था, जिसमें दूरबीन को कैमरे से जोड़कर चंद्रमा की तस्वीर उतारी गई। यह उपलब्धि फोटोग्राफी और खगोल विज्ञान के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है। 


सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों की स्थापना 

भारत में भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री पुरस्कारों की स्थापना 2 जनवरी 1954 को की गई। ये पुरस्कार देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हैं और विज्ञान, कला, साहित्य, सार्वजनिक सेवा, और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए दिए जाते हैं। 


RBI ने “MANI” मोबाइल ऐप लॉन्च किया

2 जनवरी 2020 को रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने Mobile Aided Note Identifier (MANI) मोबाइल ऐप लॉन्च किया, जो दृष्टिबाधित लोगों को भारतीय मुद्रा के नोटों (₹10 से ₹2000) की पहचान में सहायता करता है। यह ऐप कैमरे के माध्यम से नोट स्कैन कर ऑडियो व वाइब्रेशन संकेतों से जानकारी देता है और ऑफ़लाइन भी कार्य करता है।


सौरव घोषाल ने स्क्वॉश में विश्व रैंकिंग हासिल की

भारतीय स्क्वॉश खिलाड़ी सौरव घोषाल ने 2019 में इसी दिन PSA (Professional Squash Association) विश्व रैंकिंग में विश्व के शीर्ष 10 खिलाड़ियों में स्थान प्राप्त किया। वे पुरुष स्क्वॉश में भारत के पहले खिलाड़ी बने, जिन्होंने इस स्तर तक पहुँच बनाई। 



गुरुवार, 1 जनवरी 2026

आज का इतिहास : 1 जनवरी की महत्वपूर्ण घटनाएं

  


भारतीय दंड संहिता (IPC) लागू

भारतीय दंड संहिता (IPC) ब्रिटिश शासनकाल में 1 जनवरी 1862 से पूरे भारत में लागू किया गया था, जो लगभग 162 वर्षों तक भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की रीढ़ बना रहा। भारत सरकार ने 2023 में तीन नए आपराधिक कानून बनाए, जो 1 जुलाई 2024 से प्रभाव में आए और औपनिवेशिक काल के कानूनों का स्थान लिया।


महारानी विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी बनीं

1 जनवरी 1877 को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को औपचारिक रूप से भारत की साम्राज्ञी (Empress of India) घोषित किया गया। यह घोषणा दिल्ली दरबार के माध्यम से हुई और इससे भारत में ब्रिटिश राज का साम्राज्यवादी स्वरूप और स्पष्ट हुआ।


भारत में मनी ऑर्डर प्रणाली की शुरुआत

1880 में भारत में मनी ऑर्डर प्रणाली की शुरुआत हुई। इस व्यवस्था ने दूर-दराज़ क्षेत्रों में सुरक्षित धन प्रेषण को संभव बनाया और आम जनजीवन, विशेषकर ग्रामीण भारत, में डाक व्यवस्था की उपयोगिता को बढ़ाया।


महात्मा गांधी को ‘केसर-ए-हिंद’ सम्मान

1915 में महात्मा गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका में किए गए मानवीय और सामाजिक कार्यों के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘केसर-ए-हिंद’ सम्मान प्रदान किया गया। यह सम्मान उस समय सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में दिया जाने वाला एक प्रतिष्ठित अलंकरण था।


विश्व व्यापार संगठन (WTO) अस्तित्व में आया

1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization) की स्थापना हुई। यह संस्था अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों की निगरानी, व्यापार विवादों के समाधान और वैश्विक व्यापार को सुचारु बनाने के उद्देश्य से बनाई गई। इसने GATT (1947) का स्थान लिया।


यूरोप में साझी मुद्रा ‘यूरो’ का प्रचलन प्रारम्भ

1 जनवरी 1999 को यूरोप के 11 देशों ने साझा मुद्रा यूरो (€) को अपनाया। प्रारम्भ में इसका उपयोग बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन तक सीमित था, जबकि नोट और सिक्के 2002 में प्रचलन में आए। यूरोपीय एकीकरण की दिशा में यह एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है।


आज इनकी जयंती है - 


पवन दीवान जी

लोकप्रिय संत, कवि पवन दीवान (अमृतानंद) जी का जन्म 1 जनवरी 1945 को राजिम के समीप ग्राम किरवई में हुआ था। उन्होंने राजिम से ‘अंतरिक्ष’, ‘बिम्ब’ और ‘महानदी’ साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया। “तहूँ होबे राख, महूँ होहूँ राख…” उनकी अत्यंत चर्चित रचना है। वे राजिम से विधायक, मध्यप्रदेश शासन में जेल मंत्री, महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से सांसद तथा छत्तीसगढ़ गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष रहे। 


देवदास बंजारे जी

पंथी नृत्य के युगपुरोधा देवदास बंजारे जी का जन्म 1 जनवरी, 1947 को धमतरी जिले के साँकरा गाँव में हुआ था। सतनाम पंथ के धार्मिक अनुष्ठानों में प्रचलित पंथी लोक नृत्य को उन्होंने अद्भुत आकर्षण और व्यापक फलक प्रदान किया। उन्होंने लगभग 60 देशों में पंथी का प्रदर्शन कर इसे वैश्विक ख्याति दिलाई। उनके सम्मान में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा देवदास स्मृति पंथी नृत्य पुरस्कार स्थापित है। 




बुधवार, 31 दिसंबर 2025

आज का इतिहास : 31 दिसंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

 


ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 

31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा दिए गए एक शाही चार्टर के माध्यम से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई थी। इसे पूर्वी इंडीज के साथ व्यापार करने के लिए स्थापित किया गया था। व्यापार से शुरू होकर, कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप पर धीरे-धीरे नियंत्रण कर लिया, जो 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद प्रशासनिक शक्ति में बदल गया। अंत: 1858 में कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत ब्रिटिश राज के अधीन हो गया और 1874 में यह कंपनी पूरी तरह से भंग कर दी गई।


• 'बेसिन की संधि' 

31 दिसंबर 1802 को मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय ने होलकर सरदारों से हारने के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ 'बेसिन की संधि' पर हस्ताक्षर किया। संधि के तहत पेशवा को विदेशी मामलों और सेना का नियंत्रण अंग्रेजों को देना पड़ा। यह संधि मराठा साम्राज्य के पतन का एक निर्णायक बिंदु थी। आगे चलकर द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805) हुआ और 1818 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने पेशवा के क्षेत्रों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया।


लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज्य' का लक्ष्य घोषित

31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' को मुख्य लक्ष्य घोषित किया। लोगों ने ब्रितानी साम्राज्य से पूरी तरह से स्वतंत्र होकर 'अपना राज' बनाने के लिए संघर्ष करने की प्रतिज्ञा की थी। 


परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले के निषेध का समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले के निषेध का समझौता 31 दिसंबर 1988 को हस्ताक्षरित हुआ, जो 27 जनवरी 1991 से प्रभावी हुआ। समझौते का उद्देश्य दोनों देशों को एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों या सुविधाओं पर सीधे या परोक्ष रूप से हमला करने से रोकना है। 


आज इनकी पुण्यतिथि है...

1956 - पंडित रविशंकर शुक्ल जी

पंडित रविशंकर शुक्ल जी (1877–1956) स्वतंत्रता सेनानी और अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे। वे 1937 में केंद्रीय प्रांत और बरार के मुख्यमंत्री बने। 1946 से 1956 तक मध्य प्रांत के मुख्यमंत्री रहे और 1956 में मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। उनके नाम पर रायपुर में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय स्थापित है। 

1965 - वी. पी. मेनन जी

वी. पी. मेनन के नाम से जाने जाने वाले राय बहादुर वाप्पला पंगुन्नि मेनन (1893-1965) भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक प्रतिष्ठित अधिकारी थे। वे सरदार वल्लभभाई पटेल जी के सहयोगी के रूप में भी याद किए जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारतीय रियासतों के एकीकरण में उनकी अहम् भूमिका रही।  

आज का इतिहास : 30 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं

 


सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया

30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में पहली बार भारतीय तिरंगा फहराया और इसे ब्रिटिश शासन से मुक्त घोषित कर अंडमान को ‘शहीद द्वीप’ और निकोबार को ‘स्वराज द्वीप’ नाम दिया।


मद्रास को पहला नगर निगम बनाने रॉयल चार्टर जारी

 ब्रिटेन के राजा जेम्स द्वितीय द्वारा 30 दिसंबर 1687 को जारी एक रॉयल चार्टर के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 29 सितंबर 1688 को मद्रास निगम स्थापित किया गया था। यह भारत में पहला नगर निगम था, इसके बाद 1726 में बॉम्बे और कलकत्ता में निगम बने।


इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फाँसी

30 दिसंबर 2006 को इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को बगदाद में फाँसी दी गई। 1982 में 148 शियाओं की हत्या (दुजैल नरसंहार) के लिए मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी पाए जाने पर, इराकी विशेष न्यायाधिकरण ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। 


आज इनकी पुण्यतिथि है - 


1971 - डॉ. विक्रम साराभाई

डॉ. विक्रम साराभाई भारत के महान वैज्ञानिक और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं। उनके नेतृत्व में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान की नींव पड़ी और आगे चलकर इसरो (ISRO) का विकास हुआ। 

1975 - दुष्यंत कुमार जी

दुष्यंत कुमार हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय कवि और ग़ज़लकार थे। उन्होंने ग़ज़ल को मंच, आंदोलन और जनसंघर्ष की भाषा बनाया। उनकी पंक्ति - “हो गई है पीर पर्वत-सी…” हिन्दी साहित्य की अमर पंक्तियों में गिनी जाती है।

1990 - रघुवीर सहाय जी

रघुवीर सहाय हिन्दी के प्रख्यात कवि, कथाकार और पत्रकार थे। वे नयी कविता आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं। 'लोग भूल गए हैं’, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ जैसी रचनाएँ उन्हें विशिष्ट पहचान देती हैं।

2009 - राजेन्द्र अवस्थी जी

राजेन्द्र अवस्थी हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के प्रतिष्ठित नाम थे। वे लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका ‘कादम्बिनी’ के लंबे समय तक संपादक रहे। उनकी लेखनी और संपादकीय दृष्टि ने हिन्दी पत्रकारिता को नई ऊँचाइयाँ दीं।