यह कैसे संभव है कि लोहे के मजबूत धारदार हलफाल की सांघातिक चोट से मृत नवजात शिशु फिर से जीवित हो जाए? यह कैसे संभव है कि जिस बालक को आग में झोंककर मार दिया गया हो, वह फिर से खेलता हुआ लौट आए? यह कैसे संभव है कि जिन बच्चों को मारकर जंगल में फेंक दिया गया हो, वे वहाँ खेलते मिल जाएँ? यह कैसे संभव है, तालाब में बलि दिया हुआ बालक अरसे बाद फिर से जीवित लौट आए? यह कैसे संभव है कि किसी घातक अस्त्र के प्रयोग से गर्भ में ही मिटने लगा शिशु पुनर्जीवन पा जाए, वह भी केवल एक व्रत रखने से?
यह सवाल मेरे नहीं हैं? आज हर बात पर सवाल करने वाली नई पीढ़ी जिसे मौजूदा वक्त में जेन-जेड और जेन अल्फा पुकारा जा रहा है, वह हलषष्ठी व्रत की कथाओं को सुनकर क्या ऐसे सवाल नहीं करेगी? करेगी, लेकिन सवाल उठाने से हलषष्ठी व्रत की कथाएँ बदल नहीं जाएंगी। जेन-जेड और जेन अल्फा को सवाल पूछने से रोकना भी नहीं चाहिए, बल्कि उनके सवालों का हमारे पास माकूल जवाब होना चाहिए। और अगर जवाब नहीं है तो उन्हें जवाब ढूँढ़ने देना चाहिए।
मैं यहाँ हलषष्ठी व्रत की कथा नहीं सुनाऊंगा। रोचक कथाओं की पूरी श्रृंखला है, जिसे आम तौर पर हलषष्ठी का व्रत करने वाली महिलाएँ ही सुना करती हैं, पुरुषों की इसमें कोई विशेष रुचि नहीं होती? ऐसे में नई पीढ़ी के ऐसे संभावित प्रश्नों का जवाब भी उनके पास कम ही होता है। ऐसे में माताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
और यही बात हलषष्ठी व्रत का मूल है। अपनी संतति के लिए माताओं की भूमिका। सभी जानते हैं यह व्रत माताएँ अपनी संतान के दीर्घायु और कुशलता की कामना से करती हैं। किसी बालक को अपनी माँ की इस भावना से ऐतराज कैसे हो सकता है? और माँ केवल कामना ही नहीं करती, वह अपने बच्चों की कुशलता और दीर्घ जीवन के लिए पूरा यत्न भी करती है। वह अपने समर्पण से सिद्ध करती है कि वास्तव में माँ क्या होती है। यानी नई पीढ़ी को वह माँ होना भी सिखाती है।
ममता का कमरछठ से गहरा संबंध है। इसकी कथाएँ नई पीढ़ी को अविश्वनीय जरूर लग सकती हैं, लेकिन इन कथाओं का अपना महत्व है। कथाएँ आस्था को मजबूत करती हैं और आस्था लोक संस्कृति व परम्पराओं को सींचती है। और लोक संस्कृति व परम्पराएँ सर्व हितकारी गूढ़ संकेतों और संदेशों का संवाहक होती हैं। इनमें ऐसी कई बातें छिपी होती हैं, जिनका सीधा संबंध जीवन और जीवन आधार से होता है।
समाज आज जितना शिक्षित और जागरूक है, कल उतना नहीं था। बल्कि, समाज की आधी आबादी यानी महिलाएँ शिक्षा के प्रकाश से लगभग वंचित ही थीं। जबकि वे ही परिवार का आधार होती हैं। कथाओं के जरिए उन्हें आस्थापूर्वक अपनी संस्कृति व परम्पराओं से जोड़ना सरल उपाय था। हालाँकि समय के साथ विकृतियाँ आ ही जाती हैं और कई परम्पराएँ जो लोक कल्याण के भाव से शुरू हुई होती हैं, आगे चलकर विचित्र और हास्यास्पद लगने लगती हैं।
हल षष्ठी जिसे छत्तीसगढ़ की लोक भाषा में कमरछठ, खमरछठ भी कहा जाता है, उसकी व्रत पूजा परम्परा, बड़ी रोचक है। यदि इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान मानें तो इस पर कुछ कहने की जरूरत ही नहीं। और न ही एक धार्मिक विषय पर मैं कुछ कहने चाहता हूँ। किसी की भी आस्था को ठेंस पहुँचाना मेरा इरादा नहीं है। मेरी रुचि इस पूजा के विधान और इसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री पर अधिक है। इनमें गौर करने से ऐसा लगता है छत्तीसगढ़ की अनेक लोक परंपराओं की तरह इस पूजा परम्परा में भी गहरे संकेत छिपे हुए हैं।
कमरछठ पूजा के लिए गड्ढे खोदकर दो सगरी बनाए जाते हैं, यह जलाशय का प्रतीक हैं। दोनों सगरी के बीच छेद होती है। जब जल अर्पण किया जाता है तो दोनों सगरी में जल बराबर मात्रा में पहुँचता है। संदेश तो साफ है, जल ही जीवन का आधार है। तालाब, पोखर और अन्य जलस्रोतों का संरक्षण आवश्यक है। साथ ही जल पर किसी का एकाधिकार न हो। समान रूप से उपलब्धता हो। गाँव का जीवन केवल मनुष्य नहीं, बल्कि जल, वनस्पति और जीव-जंतुओं के सहजीवन पर टिका होता है।
यह सगरी क्षेत्र जो पूजा स्थल होता है, उसे काश यानी कुश से सजाया गया होता है, जिसके फूल पककर सफेद हो चुके होते हैं। यह उस बात का प्रतीक है कि, पुरखों ने अपना जीवन तपाकर जो ज्ञान और समझ अर्जित की है, वह यहाँ स्पष्ट संकेतों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया जा रहा है। इसे नहीं समझे तो, इसका कोई महत्व भी नहीं।
इस पर्व की सबसे विशिष्ट वस्तुओं में पसहर चावल शामिल है। इस पर्व परंपरा में हल से जोते गए खेत के अन्न से परहेज कर प्राकृतिक अथवा बिना हल जोती भूमि से प्राप्त खाद्य सामग्री को महत्व दिया जाता है। यह धरती और प्राकृतिक उत्पादन के प्रति सम्मान। संदेश यह है कि, मनुष्य को प्रकृति पर पूर्ण अधिकार जताने के बजाय उसके साथ संतुलन बनाकर जीना चाहिए।
पसहर भात के साथ अलग-अलग छह प्रकार की भाजियाँ ग्रहण की जाती हैं। यह स्थानीय और मौसमी होती हैं। विटामिन्स और पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। औषधीय गुणों वाली होती हैं। इस पर्व के आहार के बहाने माताओं तक पारंपरिक रूप से यह ज्ञान तो पहुँचता ही है कि, हमारे आसपास स्थानीय स्तर पर सहज रूप से उपलब्ध वनस्पतियाँ भी हमारे परिवार के पोषण में उपयोगी हो सकती हैं। इस पर्व की आवश्यक सामग्री के बहाने कम से कम इतनी पौष्टिक भाजियों के बीज पीढ़ियों के लिए संरक्षित तो रहेंगे।
इस पर्व में महुआ और उसके पत्तों से बने दोना, पत्तल का उपयोग होता है। महुआ छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और वनवासी जीवन का महत्वपूर्ण वृक्ष है। पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि भोजन, आजीविका और संस्कृति के स्रोत होते हैं। स्थानीय जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक है। जंगल और मनुष्य का संबंध सहजीवन का है। महुआ पत्तों के दोना-पत्तल का उपयोग विशेष रूप से प्राकृतिक और जैविक जीवनशैली की भी प्रेरणा देता है।
इस पर्व में भैंस का दूध-दही उपयोग में लाया जाता है, गाय का वर्जित होता है। मान्यता चाहे जो भी हो, लेकिन यह साफ है कि भारतीय ग्रामीण जीवन में गाय की धार्मिक प्रतिष्ठा अधिक है। गौ को माता कहा जाता है। पहले गायें बहुतायत से और घर-घर होती थीं। लेकिन कमरछठ में भैंस को विशेष स्थान मिलना यह संकेत देता है कि भैंस भी ग्रामीण परिवार की अर्थव्यवस्था और पोषण का महत्वपूर्ण आधार है। इस आधार को बनाए रखना भी जरूरी है। दूध, दही और घी पोषण के पारंपरिक स्रोत रहे हैं। पशुधन ग्रामीण परिवार की संपत्ति और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मनुष्य और पशु का संबंध केवल उपयोग का नहीं, बल्कि पारिवारिक और आर्थिक सहजीवन का है।
इस पर्व में धान की लाई प्रयोग में लाई जाती है। सरल और स्थानीय खाद्य पदार्थों में भी पोषण एवं संस्कृति का मूल्य निहित है।
पोता लगाना, इस पर्व का सबसे अहम विधान है। पूजा के बाद बच्चों की कमर या पीठ पर पीली छुई में भिगोए कपड़े आदि से पोता लगाने की परंपरा है। दिन भर उपवास रखकर और आस्था पूर्वक पूजा कर माँ अपने बच्चों पर इसी तरह आशीष बरसाती है। यह माँ की स्नेह भरी थप्पी होती है, जिसमें संतान के प्रति मंगलकामना निहित होती है। वह स्वस्थ रहे, सुखी रहे, दीर्घायु हो।
लोकविश्वास में इसे बच्चे के लिए मातृ-सुरक्षा या रक्षा-कवच का प्रतीक माना जाता है। यह परिवार में माँ की संरक्षक भूमिका का प्रतीकात्मक दर्शन है।
वह माँ अपने बच्चे को आशीष के रूप में जब पोता देती है, तब उसके हाथ में, उस पोता में पीली मिट्टी की भीनी परत होती है। मिट्टी धरती माँ का रूप है। यानी, एक माँ अपने बच्चे के लिए अपनी धरती माँ से भी आशीष ले आती है। वह जानती है कि धरती ही हम सबकी असली माँ है। इसकी ही गोद में जीवन है। हम अपनी इस धरती, इस माटी को मान दें। इस माटी पर उपजी वनस्पति, इस माटी पर पलने वाले समस्त प्राणियों, जीव-जंतुओं की रक्षा करें। इसके पर्यावरण की रक्षा करें। इसमें पलने वाली विविध संस्कृतियों का सम्मान करें।
यह बातें कोई शास्त्रीय विधानों का व्याख्यान नहीं है, बल्कि एक स्थानीय पर्व पूजा परम्परा में छिपे संदेशों का अनुमान लगाने और समझने का प्रयास है।
सीधे सरल अर्थों में, मेरी दृष्टि में कमरछठ की पूरी परंपरा तीन बड़े संदेश देती है- “प्रकृति बचाओ, स्थानीय प्राकृतिक आहार अपनाओ और बच्चों के भविष्य की वास्तविक चिंता करो।”
इस लोकपर्व में जल के लिए सगरी, धरती के लिए पसहर, जैव विविधता के लिए छह भाजियाँ, जंगल के लिए महुआ, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए पशुधन और मातृत्व के लिए पोता, ये सभी एक साथ दिखाई देते हैं।
इसलिए कमरछठ को केवल संतान की दीर्घायु का व्रत कहना अधूरा होगा। यह छत्तीसगढ़ के पारंपरिक जीवन-दर्शन का भी सुंदर उदाहरण है- "मनुष्य, प्रकृति, जल, अन्न, पशु और परिवार के बीच संतुलन का लोकपर्व।"
आलेख- ✍️ ललित मानिकपुरी, महासमुंद (छत्तीसगढ़)
